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अखिलेश ने सालों पहले कर दिया था जो काम, उसे अब मोदी सरकार मान रही सही; कर लिया कॉपी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बात अक्सर चर्चा में रहती है कि मौजूदा सरकारें पिछली सरकारों के फैसलों को अपनाती हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी कई मौकों पर यह दोहराते रहे हैं कि उनके कार्यकाल में शुरू किए गए कार्यों को वर्तमान सरकारें केवल फीता काटकर अपना नाम दे देती हैं। लेकिन हाल ही में एक ऐसा कदम सामने आया है जिसने इस चर्चा को एक नई दिशा दी है।

केंद्र ने अपनाया समाजवादियों का नाम

हाल ही में केंद्र सरकार ने एक बड़ा निर्णय लेते हुए देश के सभी राजभवनों का नाम बदलकर ‘लोक भवन’ करने का ऐलान किया है। केंद्रीय सचिवालय और पीएमओ (PMO) के नाम में भी बदलाव किए गए हैं। यह फैसला अचानक लिया गया लेकिन इसकी जड़ें लगभग एक दशक पुरानी हैं।

क्या आपको याद है? उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में जहाँ आज पूरी राज्य सरकार काम करती है, उस भव्य और खूबसूरत इमारत का नाम अखिलेश यादव ने ही ‘लोक भवन’ रखा था। यह उस समय की बात है जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। यह नामकरण महज़ एक नाम नहीं था बल्कि एक विचारधारा का प्रतीक था।

अखिलेश यादव का मानना था कि यह राजतंत्र नहीं लोकतंत्र है और लोकतंत्र में सत्ता का केंद्र जनता होनी चाहिए। इसलिए उन्होंने सत्ता के केंद्र को ‘राजभवन’ की बजाय ‘जनता का भवन’ – ‘लोक भवन’ नाम दिया। आज, इतने सालों बाद, केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने देश भर के राजभवनों का नाम बदलकर उसी समाजवादी सोच को राष्ट्रीय पटल पर उतारने का फैसला किया है।

इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए अखिलेश यादव ने प्रसन्नता व्यक्त की। उनका कहना था, “जनता का भवन, लोक भवन ये तो खुशी की बात है। अब तक तो वे हमारे काम की नक़ल करते थे। अब तो खुशी इस बात की है कि जिस नाम को समाजवादियों ने दिया, उसी नाम को वे अब स्वीकार कर रहे हैं।”

खतरे में इंसानियत की मिसाल

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की दूरदृष्टि केवल इमारतों के नामकरण तक सीमित नहीं है बल्कि उनकी मानवीय संवेदना में भी झलकती है। उन्होंने कई बार साबित किया है कि उनके अंदर का इंसान उनके अंदर के नेता से हमेशा आगे रहता है।

उदाहरण के तौर पर एसआईआर (साफ-सफाई से संबंधित दुर्घटना) में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को समाजवादी पार्टी की तरफ से दो-दो लाख रुपये की आर्थिक मदद देने की पहल अखिलेश यादव ने शुरू की थी। यह वह कार्य था जो सरकारों को करना चाहिए था, लेकिन पहल सपा प्रमुख ने की। इस मानवीय कदम का असर यह हुआ कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी तुरंत बंगाल में ऐसे परिवारों को दो-दो लाख रुपये की सहायता देने की घोषणा कर दी।

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एक और घटना उनकी जन-जुड़ाव और मानवीयता को दर्शाती है: एक बार सड़क पर यात्रा के दौरान जाम लगा देखकर उन्होंने पुलिस के मना करने के बावजूद अपना रूट नहीं बदला। वह उसी जाम वाले रास्ते से गए ताकि पता लगा सकें कि दिक्कत क्या है। जब उन्हें पता चला कि एक दुर्घटना में एक महिला की जान चली गई है, तो वह मौके पर रुके। उन्होंने तुरंत डीएम को फोन किया और पीड़ित परिवार को समाजवादी पार्टी की ओर से पाँच लाख रुपये की मदद की घोषणा की। साथ ही, उन्होंने डीएम से यह सुनिश्चित करने को कहा कि परिवार को अधिकतम सरकारी सहायता मिले।

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ये सभी घटनाएँ दर्शाती हैं कि अखिलेश यादव की सोच कितनी अग्रगामी और जनोन्मुख है। एक दशक पहले उनकी परिकल्पना को आज राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलना उनकी दूरदृष्टि का सबसे बड़ा प्रमाण है।

जन-जुड़ाव और विज़न की सियासत

देश में नेताओं की कमी नहीं है – सांसद, विधायक, मंत्री, मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री बहुत हैं। लेकिन जो नेता जनता से सीधा और भावनात्मक जुड़ाव महसूस करता है, वह नाम अखिलेश यादव का है। उनके लिए राजनीति का मतलब विज़न है, न कि विभाजन (डिवीजन)। वह हमेशा एक बेहतर भविष्य की कल्पना करते हैं, जिसे आज केंद्र सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर रही है।

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