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कामचोर डॉक्टरों की अब खैर नहीं! योगी सरकार का ‘ऑपरेशन क्लीन’ शुरू, एक साथ कई पर एक्शन

स्वास्थ्य विभाग में लापरवाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ योगी सरकार की मुहिम प्रशंसनीय है। पांच सरकारी डॉक्टरों को बर्खास्त किए जाने से महकमे में हड़कंप मचना स्वाभाविक बात है। सोलह चिकित्सा अधिकारियों के विरूद्ध विभागीय अनुशासनिक कार्रवाई के आदेश भी दिए गए हैं। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक का यह एक्शन चर्चाओं में है। लंबे समय से बिना सूचना ड्यूटी से अनुपस्थित रहने और चिकित्सकीय कार्यों से विरत रहने के कारण पांचों चिकित्सकों को विभाग से बाहर का रास्ता दिखाया गया है।

राज्य में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का है बुरा हाल

देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत किसी से छिपी नहीं है। जिला सरकारी अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर प्रतिदिन मरीजों की भीड़ तो उमड़ती है, मगर उन्हें पर्याप्त राहत नहीं मिल पाती। इसके अनेक कारण माने जाते हैं। सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर समय के साथ मरीजों की संख्या तो बढ़ी है, मगर उस हिसाब से संसाधन नहीं बढ़ पाए हैं।

बाहर की दवा और अवैध वसूली

मरीजों की संख्या के मानक के अनुरूप डॉक्टरों एवं नर्सों की उपलब्धता का अभाव है। हालांकि अच्छी खासी तनख्वाह मिलने के बावजूद कई सरकारी डॉक्टर काम के प्रति लापरवाही बरतते हैं। ओपीडी के समय डॉक्टरों के नदारद रहने की शिकायत आम है। कई बार गंभीर मरीजों का चैकअप किए बिना उन्हें रेफर कर दिया जाता है। पर्ची पर बाहर की दवाएं लिख दी जाती हैं। एक्सरे, अल्ट्रासाउंड और सीटी स्कैन की समुचित व्यवस्था न होने की वजह से मरीजों को प्राइवेट संस्थानों की तरफ दौड़ना पड़ता है।

सरकारी डॉक्टरों द्वारा निजी प्रैक्टिस करने या निजी क्लीनिक व अस्पताल का संचालन करने की शिकायतें भी जब तब सामने आती रहती हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में लापरवाही का खामियाजा आम मरीजों को भुगतना पड़ता है। उप्र सरकार स्वास्थ्य और शिक्षा के अलावा सबसे ज्यादा कसरत कानून व्यवस्था को सुधारने पर कर रही है। कानून व्यवस्था पटरी पर नजर आती है, मगर शिक्षा और स्वास्थ्य जगत में गंभीर खामियां समय-समय पर दिखाई देती हैं। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों व नर्सिंग स्टाफ अक्सर मरीजों व तीमारदारों के साथ रुखा व्यवहार करता है, जिससे मामला बिगड़ जाता है।

सूबे में यदि स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली दुरूस्त रहेगी तो मरीजों को भी इसका लाभ मिल सकेगा। सरकारी सेवा में आने के बाद ज्यादातर चिकित्सकों का मिजाज बदल जाता है। वह मनमानी पर उतर आते हैं। मरीजों से ऑपरेशन की एवज में भी अवैध रकम की वसूली होती है। अलबत्ता सरकार को स्वास्थ्य विभाग को पटरी पर रखने के लिए ‘ऑपरेशन क्लीन’ चलाते रहना चाहिए ताकि डॉक्टरों की मनमानी पर अंकुश लग सके। ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है, जो आवश्यकता से पचास प्रतिशत तक कम बताए जाते हैं।

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स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे का समग्र स्कोर बहुत कम हैं, विशेष रूप से ग्रामीण और उप-विभागीय अस्पतालों में। सुधारों के बावजूद स्वास्थ्य सेवा पर खर्च राज्य के कुल व्यय का सिर्फ सात प्रतिशत से कुछ अधिक है, जो निरंतर स्वास्थ्य समस्याओं में योगदान देता है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों पर लापरवाही से संबंधित वीडियो एवं फोटो अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होते रहते हैं। ऐसे में कार्रवाई के निर्देश दिए जाते हैं, मगर व्यवस्था फिर भी नहीं सुधर पाती है। सरकारी चिकित्सकों को अपनी जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन करने की जरूरत है। धरती पर चिकित्सक को भगवान का दर्जा मिला है। इस दर्जे के अनुरूप उन्हें ईमानदारी पूर्वक काम करना चाहिए।

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