आखिर क्यों एक माँ को मांगी बेटे की इच्छामृत्यु, सुप्रीम कोर्ट ने किया मंजूर
Harish Rana euthanasia: हरीश राणा…। यह नाम आजकल देशभर में चर्चाओं का विषय बन गया है। न्यूज चैनल, समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के जरिए यह नाम एकाएक हर किसी की जुबान पर है। हरीश की दर्दभरी दास्तां को जानकर हर कोई भावुक हो उठता है। छोटी-मोटी समस्याओं और बीमारियों से तंग आकर जो व्यक्ति अपनी किस्मत को कोसने से नहीं चूकते उन्हें कम से कम इस केस की स्टडी जरूर कर लेनी चाहिए।
इच्छामृत्यु की याचिका बनी चर्चा का केंद्र
चूंकि अपनी समस्या हमेशा दूसरे से बड़ी नजर आती है। अपना दर्द अधिक पीड़ादायक महसूस होता है। गाजियाबाद निवासी हरीश राणा जल्द दुनिया से चले जाएंगे। उनसे संबंधित इच्छामृत्यु की याचिका को सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंजूरी दे दिए जाने के बाद गाजियाबाद के राणा परिवार ने सभी का ध्यान अपनी ओर खींचा है। लगभग तेरह साल पहले जानलेवा हादसे का शिकार होने के बाद हरीश की जिंदगी बिल्कुल बदल गई थी।
हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण वह गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे में उनकी जान तो बच गई, मगर वह सामान्य जीवन में नहीं लौट सके। निरंतर कोमा में रहने की वजह से वह एक तरह से जिंदा लाश बन गए हैं। शीर्ष अदालत के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने राणा परिवार की सुध ली है। हरीश के परिवार की हर संभव सहायता करने की घोषणा की गई है। भारत में इच्छामृत्यु की मांग संबंधी मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं, मगर शीर्ष अदालत द्वारा इन याचिकाओं को वापस लौटा दिया जाता रहा।
कोर्ट का निर्णय राणा परिवार के लिए दोहरी भावनाएं लिए है। एक ओर इस बात का संतोष कि हरीश को ‘मुक्ति’ मिलेगी, दूसरी तरफ हरीश के चले जाने का असहनीय दुख। देश में वैसे तो इच्छामृत्यु हमेशा से बहस का मुद्दा रहा है, मगर इस पर सबसे बड़ी चर्चा पंद्रह साल पहले अरुणा शानबाग केस से आरंभ हुई थी। अरुणा मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल हॉस्पिटल में नर्स थीं। घटना पांच दशक से भी पुरानी है।
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हॉस्पिटल के सफाई कर्मचारी द्वारा बलात्कार करने के बाद कुत्ते की चेन से गला घोंट दिए जाने के कारण अरुणा को गंभीर मानसिक क्षति हुई और वह कोमा जैसी स्थिति में चली गईं। उस समय अरुणा की उम्र पच्चीस साल थी। इसके बाद वह बयालीस साल तक कोमा में रहीं। ग्यारह साल पहले अरुणा का निधन हो गया था। यह मामला भी शीर्ष अदालत तक पहुंचा था, मगर कोर्ट ने इस केस में इच्छामृत्यु की इजाजत नहीं दी थी।
उधर, हरीश राणा के परिवार की पीड़ा को महसूस करना आसान नहीं है। पिछले कई साल से वह असहनीय दर्द से गुजर रहे हैं। शिक्षित, समझदार व होनहार बेटा जिस उम्र में बूढ़े माता-पिता के लिए मजबूत सहारा बनता है, उस उम्र में हरीश कोमा की अवस्था में बेड पर बेसुध हालत में है। बेटे की इच्छामृत्यु के लिए खुद को मानसिक रूप से तैयार करने में माता-पिता को अपना कलेजा कितना मजबूत करना पड़ा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
जानें क्या है दया मृत्यु
इच्छामृत्यु या ‘दया मृत्यु’ का अर्थ है किसी असाध्य रोग से ग्रसित व्यक्ति को असहनीय पीड़ा से मुक्ति दिलाने के लिए जानबूझकर, योजनाबद्ध तरीके से उसका जीवन समाप्त करना। देश में सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कड़ी शर्तों के साथ मान्यता दी है, जिसके तहत जीवन रक्षक मशीनें हटाई जा सकती हैं। हरीश राणा के मामले में डॉक्टर अब कोर्ट के आदेश का पालन करने की तैयारी में जुट गए हैं।

