सफेदपोश आतंकियों की साजिश या पुलिस की लापरवाही, श्रीनगर धमाके का वो सच जो कोई नहीं बता रहा
J&K Blast: जम्मू-कश्मीर पुलिस की बड़ी लापरवाही सामने आई है। जिस पुलिस बल ने तीन साधारण पोस्टरों से शुरू हुई जांच को सफलतापूर्वक 3000 किलोग्राम विस्फोटकों की बरामदगी और 12 से अधिक आतंकवादियों की गिरफ्तारी तक पहुंचाया, उसी से अब एक गंभीर चूक हो गई है। यह लापरवाही इतनी भारी पड़ी कि एक बड़े हादसे में बदल गई।
शुक्रवार देर रात श्रीनगर के नौगाम पुलिस स्टेशन में एक जोरदार धमाका हुआ। यह विस्फोट उस समय हुआ जब पुलिस और फॉरेंसिक विशेषज्ञ बरामद किए गए अमोनियम नाइट्रेट और डेटोनेटर के नमूनों को एकत्र कर रहे थे। इस भीषण हादसे में लगभग एक दर्जन लोगों की जान चली गई और 27 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल बताए जा रहे हैं। मृतकों और घायलों में अधिकतर पुलिसकर्मी और फॉरेंसिक अधिकारी शामिल हैं।
एसओपी का उल्लंघन और विशेषज्ञता की कमी
ये मामला विस्फोटक (J&K Blast) सामग्री को संभालने के लिए बनाए गए मानक संचालन प्रक्रियाओं यानी एसओपी के खुले उल्लंघन की ओर इशारा करता है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विक्रम सिंह ने इस घटना को क्राइम एविडेंस को सुरक्षित रखने के नियमों का सीधा उल्लंघन बताया है। उनके मुताबिक, विस्फोटकों को इतनी दूर फरीदाबाद से श्रीनगर तक लाना ही गलत था। क्राइम एविडेंस के रूप में अदालत में पेश करने के लिए आधा किलो अमोनियम नाइट्रेट का सैंपल पर्याप्त था। बाकी बचे विस्फोटकों का वीडियो रिकॉर्डिंग सबूत के तौर पर पेश किया जा सकता था। इतने बड़े जखीरे को ले जाना और फिर उसका सैंपल लेने की प्रक्रिया में पूरी टीम लगातार खतरे में रही होगी।
दूसरी ओर विस्फोटकों से जुड़े मामलों की नोडल एजेंसी नेशनल सिक्योरिटी गार्ड यानी एनएसजी के पूर्व महानिदेशक और बम निरोधक विशेषज्ञ इस घटना को फॉरेसिंग एक्सपर्ट्स की बड़ी गलती मानते हैं।
एनएसजी के पूर्व प्रमुख का स्पष्ट मत है कि बम निरोधक विशेषज्ञ की गैरमौजूदगी में डेटोनेटर जैसे संवेदनशील उपकरणों का सैंपल लेना एक गंभीर चूक है। उन्होंने बताया कि अमोनियम नाइट्रेट में खुद से विस्फोट नहीं होता। इसके लिए डेटोनेटर में स्पार्क या चिंगारी होना बेहद जरूरी है। अमोनियम नाइट्रेट का सैंपल लेना तो आसान होता है लेकिन डेटोनेटर का सैंपल बेहद सावधानी से लिया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर बैटरी से स्पार्क करके डेटोनेटर में विस्फोट किया जाता है मगर तेज कंपन या झटके से भी यह फट सकता है। खासकर यदि डेटोनेटर घर पर तैयार किया गया हो तो यह आशंका और बढ़ जाती है।
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क्या हादसे को टाला जा सकता था
पूर्व एनएसजी प्रमुख ने जोर देकर कहा कि विस्फोटकों और डेटोनेटर की पहचान केवल बम डिस्पोजल स्क्वाड का प्रशिक्षित जवान ही कर सकता है। फॉरेंसिक विशेषज्ञ का काम केवल उसमें प्रयुक्त रसायनों की पहचान करना होता है। यदि विस्फोटक और डेटोनेटर को अलग-अलग रखा जाता और बम स्क्वाड द्वारा ही सैंपल लेने की प्रक्रिया पूरी की जाती तो इस बड़े हादसे को टाला जा सकता था।
फिलहाल घायलों को श्रीनगर के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कराया गया है और मृतकों की पहचान की कोशिशें जारी हैं। यह विस्फोटक सामग्री उस ‘सफेदपोश आतंकी मॉड्यूल’ मामले से जुड़ी थी जिसका पर्दाफाश अक्टूबर के मध्य में नौगाम के बनपोरा में दीवारों पर मिली धमकी भरे पोस्टरों से हुआ था। पुलिस ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए 19 अक्टूबर को केस दर्ज किया था।
अब सवाल ये है कि इतनी बड़ी सफलता हासिल करने वाली टीम ने विस्फोटक जैसे खतरनाक सबूतों को संभालते समय इतनी बड़ी लापरवाही कैसे कर दी। जांचकर्ता अभी भी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि जब्त किए गए विस्फोटकों का संभावित लक्ष्य क्या था। अधिकारी मानते हैं कि इस बारे में कोई भी जानकारी अभी केवल अनुमान है।
ये दुर्घटना जम्मू-कश्मीर पुलिस के लिए एक बड़ा सबक है। सुरक्षा और एसओपी के मामले में कोई भी ढिलाई कितनी भारी पड़ सकती है यह इस दुखद घटना ने साबित कर दिया है।

