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Saiyaara Movie Review: इन फिल्मों से मेल खाती है फिल्म सैयारा, जानें स्टोरी क्या है

Saiyaara Movie Review: सैयारा मतलब… तारों में इक तन्हा तारा खुद जलकर जो रोशन कर दे जग ये सारा। डायलॉग तो बस एक है, मगर इसके पीछे छुपा दर्द पूरी फिल्म पर हावी है। निर्देशक मोहित सूरी (Mohit Suri) एक बार फिर उस राह पर लौटे हैं, जहां इश्क में खुद को खो देने की कहानी सिर्फ शब्दों में नहीं, सुरों और सन्नाटों के बीच जीवित हो उठती है। ‘सैयारा (Saiyaara)’, मोहित की उसी इमोशनल सिनेमैटिक ब्रह्मांड की अगली कड़ी है, जिसमें ‘मूवी लाइक आशिकी 2 (Movie Like Aashiqui 2)’ की टीस, ‘मूवी लाइक एक विलेन (movie like Ek Villain)’ की तड़प और ‘मूवी लाइक मालंग (movie like Malang)’ की बेचैनी की झलक मिलती है।

क्या है फिल्म की स्टोरी

केंद्र में हैं कृष कपूर कैरेक्टर (Krish Kapoor character) (अहान पांडे (Ahaan Pandey)), एक युवा संगीतकार जिसकी आँखों में स्टार बनने का सपना और दिल में किसी अधूरी धुन की टीस है। कृष के किरदार की पहली झलक ही साफ कर देती है कि वह लाउड नहीं भीतर से टूटा हुआ है गुस्सैल, भावुक और खुद से ही लड़ता हुआ।

वहीं, वाणी बत्रा कैरेक्टर (Vaani Batra character) (अनीत पड्डा (Anit Padda)) की दुनिया एकदम उलट है। एक दर्दनाक ब्रेकअप के बाद खुद में सिमटी हुई लड़की जो बोलती कम है, मगर उसकी आंखें बहुत कुछ बयां कर जाती हैं। वह कविताएं लिखती है, दिल के घावों को शब्दों में पिरोती है। (Saiyaara Movie Review)

कृष और वाणी की मुलाकात सिर्फ एक प्रेम कहानी की शुरुआत नहीं है बल्कि दो अधूरी आत्माओं के मिलने की प्रक्रिया है। दोनों साथ मिलकर गीत रचते हैं, सपने संजोते हैं और एक नई सुबह की उम्मीद जगाते हैं। मगर मोहित सूरी (Mohit Suri) की फिल्मों की तरह यहां भी मोहब्बत की राह सीधी नहीं है। जब सब कुछ सही लगने लगता है, कहानी मोड़ लेती है और यहीं से शुरू होती है एक भावनात्मक उथल-पुथल।

स्टोरी इन फिल्मों से खाती है मेल

मोहित सूरी (Mohit Suri) रोमांटिक-ट्रैजिक जोन के अनुभवी कारीगर हैं। ‘सैयारा (Saiyaara)’ की कहानी भले ही कुछ जगहों पर ‘आशिकी 2 (Aashiqui 2)’ और ‘यू मी और हम’ का मेल लगती हो, मगर जिस तरीके से वे किरदारों की भावनाओं को स्क्रीन पर पेश करते हैं वो बांध कर रखता है।

पहला हाफ खास तौर पर मजबूत है। कृष-वाणी की मुलाकात उनके सपनों की उड़ान और बीच-बीच में आते गीत दर्शकों को रोमांचित करते हैं। मगर इंटरवल के बाद जब कहानी अचानक मुड़ती है टूविस्ट के साथ।

फिर भी मोहित सूरी (Mohit Suri) का निर्देशन इस कदर भावनात्मक डोर बुनता है कि दर्शक फिल्म के अंत तक जुड़ा रहता है।

फिल्म की कमज़ोर कड़ियां क्या

जहां फिल्म अपने संगीत और इमोशन से पकड़ बनाती है, वहीं इसकी कहानी में मौलिकता की कमी महसूस होती है। सेकंड हाफ में वाणी की बीमारी और कृष की अचानक शोहरत जैसी बातें जल्दीबाज़ी में और अविश्वसनीय लगती हैं।

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