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सिर्फ 5 सीटें नहीं, ओवैसी ने तेजस्वी से छीन लीं 8 और, जानें बिहार में ‘MY’ समीकरण कैसे हुआ ध्वस्त

बिहार की राजनीति में इस बार जो सबसे बड़ा उलटफेर हुआ है, वह है असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) का सीमांचल में गहराता असर। चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया कि ओवैसी अब सिर्फ एक फैक्टर नहीं बल्कि एक मजबूत खिलाड़ी बन चुके हैं। जिस तरह से उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के गढ़ में सेंध लगाई है, वह न सिर्फ तेजस्वी यादव के लिए एक सबक है, बल्कि बिहार के पूरे राजनीतिक समीकरण को समझने की एक नई कुंजी भी है।

RJD को डबल झटका

ओवैसी की एआईएमआईएम ने इस चुनाव में वह कर दिखाया जिसकी शायद किसी को उम्मीद नहीं थी। उन्होंने आरजेडी से छीनी हुई अपनी सभी पांच सीटें तो वापस जीती हीं, साथ ही आठ अन्य सीटों पर महागठबंधन की हार का सीधा कारण भी बने।

याद कीजिए, चुनाव से ठीक पहले ओवैसी ने तेजस्वी यादव को क्या नसीहत दी थी? उन्होंने कहा था कि चुनाव के बाद बच्चों की तरह सिसक-सिसक कर रोना मत! यह तंज गठबंधन न हो पाने की नाराजगी से उपजा था। ओवैसी ने आरजेडी के साथ गठजोड़ की इच्छा जताई थी और सीमांचल की छह सीटें मांगी थीं, लेकिन तेजस्वी नहीं माने। आज यही हठधर्मिता उन्हें भारी पड़ गई है।

कैंडिडेट नहीं, पार्टी में है ‘दम’

पिछली बार (2020) एआईएमआईएम ने पांच सीटें जीती थीं, लेकिन अमौर से जीते अख्तरुल ईमान को छोड़कर बाकी चार विधायक पाला बदलकर आरजेडी में चले गए थे। तब यह माना गया था कि जीत शायद व्यक्तिगत लोकप्रियता की वजह से मिली है।

मगर इस बार एआईएमआईएम ने उन्हीं सीटों को दोबारा जीतकर यह साबित कर दिया कि दम कैंडिडेट में नहीं, बल्कि पार्टी और उसके नैरेटिव में है! उन्होंने 28 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और अमौर, कोचाधामन, बहादुरगंज, जोकीहाट जैसी पांच सीटें फिर से जीत ली हैं।

वोटों का बंटाधार और स्ट्राइक रेट

इस चुनाव में एनडीए ने 202 सीटें हासिल कीं, जिसमें बीजेपी को 89 और जेडीयू को 85 सीटें मिलीं। महागठबंधन सिर्फ 35 सीटों पर सिमट गया, आरजेडी 75 से गिरकर 25 पर आ गई। इस आंधी में ओवैसी ने अपना पिछला प्रदर्शन कैसे दोहराया, यह लोगों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है।

एआईएमआईएम का स्ट्राइक रेट महागठबंधन की पार्टियों से कहीं बेहतर रहा। आरजेडी 143 सीटों पर लड़कर सिर्फ 25 जीत पाई, जबकि एआईएमआईएम ने दो सीटों पर दूसरा और 14 सीटों पर तीसरा स्थान हासिल किया।

ठाकुरगंज और बलरामपुर जैसी सीटों पर वोटों का बंटवारा साफ नजर आया। ठाकुरगंज में एआईएमआईएम प्रत्याशी गुलाम हसनैन को 76,000 से अधिक वोट मिले और वह दूसरे नंबर पर रहे, जबकि आरजेडी के सऊद आलम 60,000 वोट पाकर तीसरे नंबर पर रहे। अगर यह वोट नहीं बंटा होता, तो आरजेडी के जीतने की संभावना बहुत अधिक थी। बलरामपुर में भी यही कहानी दोहराई गई।

‘MY’ समीकरण में सेंध

आरजेडी का कोर वोटर माने जाने वाला मुस्लिम समुदाय इस बार बुरी तरह बंटा। एआईएमआईएम ने सीधे-सीधे एमवाई समीकरण को तोड़ने का काम किया है। 28 में से 10 सीटों पर एआईएमआईएम को जीत-हार के अंतर से भी ज्यादा वोट मिले, और इसमें से आठ सीटों पर महागठबंधन के प्रत्याशियों को सीधा नुकसान हुआ है।

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इस पूरे खेल के पीछे एक बड़ी वजह थी सत्ता में हिस्सेदारी का सवाल। ओवैसी ने सबसे पहले मुस्लिम डिप्टी सीएम बनाने की बात कहकर एक बड़ा नैरेटिव सेट किया। इससे आरजेडी को भारी नुकसान हुआ। मुस्लिम वोट बैंक को केवल वोट समझने वाली बात घर-घर तक पहुंची, जिससे नाराजगी पैदा हुई।

महागठबंधन ने मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम घोषित करके शायद एक बड़ी रणनीतिक गलती कर दी। इस ऐलान ने मुस्लिम वोटर्स में फूट डाल दी। नतीजा यह हुआ कि सहनी को एक भी सीट नहीं मिली और आरजेडी को बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा।

एआईएमआईएम की सीमांचल में यह जीत बताती है कि उनकी जमीनी पकड़ मजबूत हो चुकी है। यह साफ है कि आरजेडी और कांग्रेस की सीमांचल में कमजोरी अब सबके सामने आ चुकी है। तेजस्वी के लिए यह वक्त है कि वह इस कमजोरी को जल्द से जल्द दूर करें, वरना बिहार की मुस्लिम राजनीति का केंद्र अब शायद पटना नहीं, बल्कि सीमांचल बन जाएगा।

फिलहाल, ओवैसी ने बिहार की राजनीति में अपनी अमिट छाप छोड़ दी है।

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