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बिहार चुनाव में बगावत की आंधी, एनडीए और महागठबंधन के भीतर उठी विद्रोह की लहर

Bihar Election News 2025: बिहार विधानसभा चुनाव में इस बार सियासी दलों के अंदर ही असंतोष और बगावत का साया गहरा गया है। प्रमुख गठबंधन एनडीए और महागठबंधन, एक ओर जहां आपस में मुकाबला कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उनके भीतर के नेता भी चुनावी मैदान में बगावती लहर पैदा कर रहे हैं। विभिन्न दलों के भीतर विद्रोही नेताओं ने अपने ही पार्टी के उम्मीदवारों के खिलाफ खुलकर चुनौती पेश की है और कई जगह निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनावी जंग में कूद पड़े हैं।

इसके अलावा, छोटे दलों के उम्मीदवारों ने भी अपनी ताकत दिखाने का इरादा किया है, जिससे राजनीतिक समीकरण और भी जटिल हो गए हैं। इस सबका असर पार्टी के भीतर अंदरूनी एकता पर भी पड़ रहा है, जिससे पार्टी नेतृत्व को नए संकटों का सामना करना पड़ रहा है।

राजद और जदयू में बगावत की तस्वीर

राजद और जदयू जैसे प्रमुख दलों में बगावत की तस्वीर खासतौर पर साफ नजर आ रही है। राजद ने उन 37 नेताओं को पार्टी से निष्कासित कर दिया है, जो अपनी ही पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ मैदान में उतरे थे या फिर अन्य गतिविधियों में शामिल थे। वहीं जदयू ने भी अपनी पार्टी के दो पूर्व मंत्रियों, चार विधायकों और तीन विधान पार्षदों सहित कुल 16 नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया है।

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राजद के भीतर विद्रोह की लहर ऐसे समय में उठी है, जब पार्टी अपने उम्मीदवारों को लेकर आश्वस्त थी। कई प्रमुख सीटों पर बागी उम्मीदवारों ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जिनमें से कुछ नाम इस प्रकार हैं:

  • परिहार: स्मिता पूर्व (पार्टी) – रितु जायसवाल (निर्दलीय)
  • महनार: इ. रवीद कुमार सिंह (पार्टी) – संजय राय (निर्दलीय)
  • संदेश: दीपू सिंह (पार्टी) – मुकेश सिंह यादव (निर्दलीय)
  • जदयू की स्थिति भी कुछ अलग नहीं है। वहां पर कई सीटों पर पार्टी के अधिकृत उम्मीदवारों के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवारों ने ताल ठोकी है, जैसे कि: जमालपुर: नचिकेता मंडल (पार्टी) – शैलेश कुमार (निर्दलीय)
  • बरबीघा: डॉ कुमार पुष्पंजय (पार्टी) – सुदर्शन कुमार (निर्दलीय)

एनडीए और महागठबंधन में खींचतान (Bihar Election News 2025)

एनडीए और महागठबंधन दोनों ही गठबंधन अपने-अपने दलों की सीटों के लिए तालमेल साधने में जुटे हुए हैं, लेकिन कई बार उनके अंदर के नेताओं ने इस तालमेल को तोड़ने का प्रयास किया है। कई सीटों पर बागी नेताओं ने अपने विरोधियों को मात देने के लिए निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। इस प्रकार के घटनाक्रम से चुनावी समीकरण में उलटफेर होने की पूरी संभावना है।

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एनडीए और महागठबंधन दोनों ही गठबंधन अब अपने बागी उम्मीदवारों को लेकर दबाव में हैं, क्योंकि ये उम्मीदवार न केवल उनकी चुनावी रणनीतियों को प्रभावित कर सकते हैं, बल्कि उन दलों की पार्टी की प्रतिष्ठा पर भी सवाल उठा सकते हैं।

उदाहरण स्वरूप एनडीए के दिनारा सीट पर आलोक सिंह (रालोमो) और जय कुमार सिंह (जदयू) के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है, वहीं महुआ सीट पर संजय सिंह (लोजपा) और डॉ आसमा परवीन (जदयू) के बीच मुकाबला तेज हो सकता है।

बागी उम्मीदवारों का बढ़ता प्रभाव

विद्रोह का असर केवल प्रमुख दलों तक ही सीमित नहीं रहा। कई छोटे दलों और निर्दलीय उम्मीदवारों ने भी चुनावी दंगल में कूदकर अपनी ताकत दिखाई है। महागठबंधन और एनडीए दोनों ही गठबंधन अब इन बागियों को अपने चुनावी अभियान में खलल डालते हुए देख रहे हैं। महागठबंधन में कटिहार और केसरिया जैसी सीटों पर बागी उम्मीदवार राजद और वीआईपी के खिलाफ निर्दलीय रूप से उतरे हैं, जबकि एनडीए के अंदर भी कुछ सीटों पर इसी प्रकार की स्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं।

चुनावी माहौल में उथल-पुथल का असर आम जनता पर

चुनाव की तारीखों के करीब आते ही बिहार में चुनावी माहौल और भी गरमा गया है। बागी उम्मीदवारों का उत्थान और प्रमुख दलों के भीतर के विवाद ने मतदाताओं के बीच असमंजस पैदा कर दिया है। हालांकि, यह स्थिति कुछ समय के लिए दलों के भीतर आंतरिक प्रतिस्पर्धा को तेज कर सकती है, लेकिन अंततः इसका असर चुनावी परिणामों पर क्या होगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

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अब सवाल यह है कि क्या इन बागी उम्मीदवारों की उपस्थिति से वोटों का बंटवारा होगा, और अगर हां, तो इसका फायदा कौन उठाएगा? क्या यह स्थिति जनता के लिए विकल्पों का एक नया समूह प्रस्तुत करेगी, या फिर यह राजनीतिक असंतोष का रूप लेगी जो चुनावी परिणामों को अप्रत्याशित मोड़ पर पहुंचा सकती है?

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बता दें कि बिहार विधानसभा चुनाव में बगावत और विद्रोह की लहर ने राज्य की राजनीति को पूरी तरह से प्रभावित किया है। एनडीए और महागठबंधन दोनों ही गठबंधन अब अपने नेताओं की नाराजगी और निर्दलीय उम्मीदवारों की बढ़ती ताकत के बीच फंसे हुए हैं। हालांकि इस स्थिति ने चुनावी मैदान को और भी रोमांचक बना दिया है, लेकिन इसका असर केवल राजनीतिक दलों पर नहीं, बल्कि आम जनता पर भी पड़ सकता है। चुनावी नतीजे अब केवल गठबंधन के नेताओं पर नहीं, बल्कि उनके विद्रोही दलों की रणनीतियों पर भी निर्भर करेंगे।

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