सपा बीजेपी की 27 की लड़ाई, तीसरे मोर्चे ने किसकी टेंशन बढ़ाई; जानें यहां
UP Political Strategy: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की हलचल तेज हो चुकी है और सियासी रुझान बदलते हुए नए गठजोड़ की संभावना को जन्म दे रहे हैं। इस बार यूपी की राजनीति में एक नया मोर्चा उभरने की चर्चा जोर पकड़ रही है, जिसमें दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को अहम जगह दी जा सकती है। यह मोर्चा जहां एक ओर सपा और भाजपा के पारंपरिक मुकाबले को चुनौती देगा। वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के लिए भी एक नई चुनौती बन सकता है।
नए मोर्चे की ओर बढ़ते कदम
कांग्रेस के लिए शनिवार का दिन काफी अहम था, जब पार्टी के वरिष्ठ नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने अपने समर्थकों के साथ कांग्रेस छोड़ने का ऐलान किया। यह कदम उत्तर प्रदेश की सियासत में किसी बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। नसीमुद्दीन ने 73 नेताओं के साथ कांग्रेस को अलविदा लिया और कहा कि उन्हें अब कांग्रेस में अपने उद्देश्य की प्राप्ति संभव नहीं लगती। उनकी ये टिप्पणी कांग्रेस के भीतर हो रहे बदलावों की ओर इशारा करती है और इस फैसले के बाद प्रदेश में नए राजनीतिक समीकरण बनने की उम्मीद जताई जा रही है।
कांग्रेस का झटका और नए गठबंधन की सम्भावनाएं
नसीमुद्दीन सिद्दीकी के कांग्रेस छोड़ने को यूपी की सियासत में एक बड़ा झटका माना जा रहा है। उन्होंने कहा कि उनका कांग्रेस में शामिल होने का उद्देश्य दलितों और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा था, मगर अब पार्टी में ऐसी ताकतें बढ़ गई हैं, जो उनके इस उद्देश्य में रुकावट डाल रही हैं। सिद्दीकी ने यह भी संकेत दिया कि वह एक नया राजनीतिक मोर्चा बनाने पर विचार कर रहे हैं, जिसमें उनके साथ कई अन्य दल भी जुड़ सकते हैं।
दलितों और पिछड़ों का नया मोर्चा?
यूपी की सियासत में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भूमिका अहम रही है और अब इस वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए एक तीसरे मोर्चे का गठन हो सकता है। यह मोर्चा सपा और भाजपा के बीच की पारंपरिक जंग को एक नई दिशा दे सकता है। इस मोर्चे में शामिल होने के लिए कई छोटे- बड़े नेता और दल सक्रिय हैं। इसमें मुख्य रूप से स्वामी प्रसाद मौर्य की राष्ट्रीय शोषित समाज पार्टी, चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी और जनवादी पार्टी के नेता डॉ. संजय चौहान का नाम सामने आ रहा है।
ओवैसी मिला सकते हैं बसपा से हाथ
अभी ये स्पष्ट नहीं है कि इस तीसरे मोर्चे में कौन-कौन सी पार्टियाँ शामिल होंगी, मगर चर्चाएँ हो रही हैं कि असुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और मायावती की बसपा भी इस मोर्चे में शामिल हो सकती हैं। सियासी सूत्रों की मानें तो इस गठबंधन को मजबूत करने के लिए इन दलों के बीच बातचीत चल रही है। इसके साथ साथ कुछ नेताओं की आंतरिक असंतोष के कारण अपने दलों से बाहर निकलने की संभावना है, जो तीसरे मोर्चे को और मजबूती दे सकते हैं।
शंकराचार्य पर योगी की तल्खी, अखिलेश का तंज साधु-संत तंग
क्या कांग्रेस और सपा के लिए खतरा?
यदि नसीमुद्दीन सिद्दीकी और अन्य नेता इस नए मोर्चे से जुड़ते हैं, तो यह सपा और कांग्रेस के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है। सपा को जहां अपनी पारंपरिक वोट बैंक की रक्षा करनी होगी। वहीं कांग्रेस को भी अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ सकता है। इस मोर्चे का प्रभाव यूपी की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है, क्योंकि यह जातिवादी राजनीति की पारंपरिक धारा को चुनौती देगा और एक नया राजनीतिक विमर्श शुरू कर सकता है।
अखिलेश के नहले पर योगी का दहला, मिशन 2027 से पहले किया खेला
हालांकि, ये स्पष्ट नहीं है कि तीसरा मोर्चा उत्तर प्रदेश में कितनी ताकत हासिल कर पाएगा मगर राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस गठबंधन का असर दोनों प्रमुख पार्टियों पर हो सकता है। सपा और कांग्रेस को अपने समक्ष एक मजबूत विपक्षी मोर्चा मिलेगा, जो उनकी राजनीति को प्रभावित कर सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस मोर्चे का गठन किस दिशा में होता है और इसका सियासी असर क्या होता है।

