बिहार की सत्ता में मुस्लिमों का महत्व, जानें क्यों हर पार्टी को चाहिए उनका वोट
बिहार की राजनीति हमेशा सामाजिक और जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है (Bihar Politics)। जैसे-जैसे Bihar Assembly Elections करीब आ रहे हैं, राज्य का राजनीतिक पारा चढ़ता जा रहा है। इस परिदृश्य में एक बड़ा और असरदार तबका जो हर बार सियासी दलों का ध्यान खींचता है वो है Muslim Community India। बिहार में Muslim Population in Bihar लगभग 2.31 करोड़ के करीब है, जो कुल जनसंख्या का लगभग 17.70% हिस्सा बनाते हैं। इस संख्या के चलते उन्हें नजरअंदाज करना किसी भी पार्टी के लिए नामुमकिन है (Muslim Vote Bank)।
बिहार की राजनीति में मुस्लिमों की ऐतिहासिक उपस्थिति
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान बिहार के कई Muslim Leader Bihar ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी अहम भूमिका निभाई। सबसे पहला नाम आता है मोहम्मद युनूस का, जो 1936-37 में बिहार प्रांत के पहले प्रधानमंत्री बने थे, जब राज्य प्रमुखों को ‘प्रधानमंत्री’ कहा जाता था। इसके अलावा मौलाना मजरूहल हक और मोहम्मद अब्दुल बारी जैसे नेताओं ने भी आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। (Bihar Muslim History)।
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इतिहास के पन्नों में सर अली इमाम और इमाम हसन जैसे नेताओं की भी उल्लेखनीय भूमिका रही है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भागीदारी दर्ज कराई और बिहार की राजनीतिक ज़मीन को मजबूती दी।
आज़ादी के बाद भी जारी रहा सियासी सफर
स्वतंत्र भारत में भी बिहार के मुस्लिम नेताओं ने संसद और विधानसभा में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। संसद में सैयद महमूद, मोहम्मद इस्लामुद्दीन और अब्दुल इब्राहिम जैसे नाम सामने आए, जबकि विधानसभा में ताजुद्दीन, मंजूर अहमद, एसएम लतीफुर्रहमान, सगीरूल हक, फैजुल रहमान, शफी, शाह मुश्ताक साहब, और मोहिउद्दीन मोख्तार जैसे नेताओं ने अपनी जगह बनाई। (Political Participation of Muslims)
जेपी आंदोलन में मुस्लिमों की भागीदारी
1974 का साल देश की राजनीति में एक अहम मोड़ था जब जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का नारा दिया। उस समय कांग्रेस से जुड़े अधिकांश मुस्लिम नेता इस आंदोलन से दूरी बनाए रहे, फिर भी कुछ मुस्लिम चेहरों ने साहस के साथ इस आंदोलन में भाग लिया। इन नामों में सबसे प्रमुख हैं Abdul Bari Siddiqui, जो आंदोलन में सक्रिय रहे और जेल भी गए। (Jayaprakash Movement Muslims)
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लालू यादव और एम-वाई समीकरण
1990 के दशक में Lalu Yadav MY Equation ने बिहार की राजनीति में नया समीकरण गढ़ा। यादव और मुस्लिम समुदाय को एक मंच पर लाकर उन्होंने ‘एम-वाई’ समीकरण बनाया, जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया। Muslim Vote Bank ने उन्हें भरपूर समर्थन दिया, मगर समय के साथ जब Nitish Kumar Muslim Vote की राजनीति मजबूत हुई, तो यह एकता बिखरने लगी। आज मुस्लिम वोट बैंक पूरी तरह से किसी एक पार्टी के साथ नहीं जुड़ा, बल्कि वह आरजेडी, कांग्रेस, जेडीयू और AIMIM Bihar के बीच बंट चुका है। (Vote Division of Muslims)
सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ा मुस्लिम समाज
राजनीतिक प्रभाव और बड़ी जनसंख्या के बावजूद बिहार का मुस्लिम समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से आज भी पिछड़ा हुआ है (Bihar Muslim Backwardness)। जाति आधारित जनगणना के अनुसार, राज्य के मुस्लिमों में लगभग 70% ‘Pasmanda Muslim’ यानी सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमान हैं। ‘Ashraf Muslim’ की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, मगर पूरे समुदाय में शिक्षा (Bihar Muslim Education) का स्तर चिंताजनक है।
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पूर्व सांसद और ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के अध्यक्ष अली अनवर का मानना है कि मुस्लिमों को शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक अधिकारों से वंचित रखा गया है। उनका कहना है कि कोई भी मां-बाप अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देना चाहता है, मगर जब व्यवस्था सहयोग न दे तो यह सपना अधूरा रह जाता है। सरकारी स्कूलों में मुस्लिम बच्चों का Muslim Dropout Rate सबसे अधिक है, और निजी स्कूलों की ऊंची फीस पसमांदा परिवारों की पहुंच से बाहर है। (Muslim Social Status)
आज की राजनीतिक तस्वीर
बिहार की सियासत में आज भी कई Muslim Leader Bihar सक्रिय हैं जैसे Abdul Bari Siddiqui और गुलाम गौस, ये लोग समुदाय की आवाज़ को सदन तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। AIMIM Bihar नेता अख्तरुल ईमान का कहना है कि मुस्लिमों ने भारत की आजादी में जान की बाज़ी लगाई, फिर भी आजादी के बाद उनके साथ शक और भेदभाव का व्यवहार किया गया। (Muslim Community India)
सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में उनकी भागीदारी आज भी उनकी जनसंख्या के अनुपात में नहीं है। उन्हें बार-बार Muslim Vote Bank के तौर पर इस्तेमाल किया गया, मगर हक और सम्मान नहीं मिला। यही वजह है कि आज भी मुस्लिम समाज शिक्षा और सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ रहा है। (Political Participation of Muslims)


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