BJP-सपा को तगड़ा झटका; मायावती ने खोल दिए अपने पत्ते, गठबंधन पर दी बड़ी सफाई
बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सुप्रीमो मायावती का ‘गोल्डन टाइम’ क्या लौटकर आएगा? देश के सबसे बड़े सूबे की सत्ता पर क्या वह एक बार फिर खुद को स्थापित करने में सफल हो पाएंगी? भाजपा और सपा को पीछे छोड़कर क्या वह बड़ा सियासी उलटफेर कर सकेंगी? उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इसके मद्देनजर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो रही है। इस बीच बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिए हैं।
उन्होंने घोषणा की है कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी किसी के साथ गठबंधन नहीं करेगी बल्कि अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी। मायावती को यह बयान इसलिए देना पड़ा है, क्योंकि पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया पर इस प्रकार की खबरें प्रसारित हो रही हैं कि विधानसभा चुनाव में बसपा गठबंधन के सहारे किस्मत आजमाएगी। इन खबरों से परेशान होकर मायावती को आगे आना पड़ा है। उन्होंने विपक्षी दलों की आलोचना की है।
मायावती ने जो मुकाम हासिल किया, वो हर किसी के लिए मुमकिन नहीं
देश की राजनीति में मायावती ने जो मुकाम हासिल किया है, वह हर किसी के लिए मुमकिन नहीं हो पाता। बसपा की जमीनी कार्यकर्ता से लेकर मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना उनके लिए कतई आसान नहीं रहा था। सियासत में उनके गोल्डन टाइम को जब तब याद किया जाता है। पिछले कुछ साल से वह अच्छे वक्त की आस लगाए बैठी हैं।
राजनीति में मायावती के फर्श से अर्श तक और अर्श से फर्श तक पहुंचने का सफर काफी दिलचस्प रहा है। उन्हें अनेक उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। फिलहाल उनके सितारे अच्छे नहीं चल रहे हैं। यूपी की सत्ता में पूर्ण बहुमत के साथ पुन: वापसी करने की उम्मीदों के साथ उन्होंने नए सिरे से तैयारी तेज कर दी है। उन्हें भरोसा है कि अगले विधानसभा चुनाव में उन्हें राज्य के मतदाताओं का भरपूर साथ मिल सकेगा।
दलित समाज में मायावती की तगड़ी पकड़ी
बदलते वक्त के साथ कई पुराने करीबी मायावती से दूर हो चुके हैं। बसपा में मायावती के बाद नंबर 2 पर उनके भतीजे आकाश आनंद का नाम लिया जाता है। आकाश के ससुर को भी पार्टी ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी हैं। दलित समाज पर मायावती का आज भी गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर और बसपा संस्थापक दिवंगत कांशीराम के नाम के सहारे वह अपनी चुनावी नाव को किनारे लगाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। सत्ता पर काबिज होना उनके लिए इतना आसान नहीं माना जा रहा है।
अखिलेश का ‘मिशन 108’: बीजेपी के इन अभेद्य किलों में सेंध लगाने की तैयारी, जानें क्या है प्लान
भाजपा के अलावा सपा-कांग्रेस के संभावित गठबंधन से उन्हें चुनौती मिलना तय हैं। मायावती ने विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर कैडरों को सक्रिय कर दिया है। बसपा हमेशा कैडर आधारित पार्टी रही है। पार्टी ने जमीनी स्तर से नेतृत्व तैयार कर प्रदेश में सफलता हासिल की है। बसपा में सफल होने के बाद नेता दूसरे दलों की राह पकड़ते दिखे हैं। ऐसे में पार्टी जमीनी कार्यकर्ताओं के सहारे दोबारा से खोए जनाधार को पाने की कोशिश में है। इसमें गठबंधन की राजनीति से पार्टी को कोई बड़ा लाभ होता नहीं दिखा।
छह साल पहले सपा के साथ गठबंधन के बाद बसपा के दलित मतों में बिखराव दिखा था। बसपा एक बार फिर अपने जनाधार को वापस लाने के प्रयास में जुटी है। मायावती की रणनीति कामयाब हुई तो सपा-भाजपा को झटका लग सकता है। बसपा प्रमुख के सक्रिय होने से पुराने एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं में भी ऊर्जा का संचार होने लगा है। मिशन इलेक्शन में बसपा का प्रदर्शन कैसा रहेगा, इसके लिए अभी इंतजार करना होगा।

