वंचित बहुसंख्यकों के सशक्तिकरण हेतु जाति विनाश पर सोशलिस्ट नज़रिया
प्रो. शालिनी आंबेडकर
दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के डिप्टी स्पीकर हॉल में बीते 1 मई 2026 को स्वतंत्रता सेनानी, समाजवादी विचारक व पूर्व सांसद मधु लिमये की 103वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया था। विचार गोष्ठी का विषय था – वंचित बहुसंख्यकों के सशक्तिकरण हेतु जाति विनाश पर सोशलिस्ट नज़रिया। विषय अपने आप में वृहद था जिसपर विचार प्रस्तुत, मंथन व आदान-प्रदान करने के लिए देशभर से 86 साथियों को आमंत्रित किया गया था।
पहले प्रमुख वक्ता के तौर पर सबसे पहले भँवर मेघवंशी ने अपने विचार प्रस्तुत करते हुए कहा कि लोकतंत्र को बनाये रखने के लिए संवाद अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि असहमतियों के दौर में संवाद ही वह ताकत है जो लोकतंत्र को बचाए रखने का उपयुक्त समाधान प्रस्तुत करता है इसलिए लोकतंत्र को बनाये रखने के लिए संवाद के ज़रिए साझे मिलन बिंदुओं को सोचकर आगे बढ़ना चाहिए।
दूसरे प्रमुख वक्ता के रूप में निशिकांत कोलगे ने बताया कि भारतीय समाजवाद की क्या उपलाधियाँ रहीं और इसके विघटन के क्या कारण रहे। समाजवाद साम्यवाद व ब्राह्मणवाद के बीच की धारा रही है जिसमें भी कई नज़रिए रहे हैं जैसे गाँधी, लोहिया, कर्पूरी, जेपी, लालू, नीतीश नज़रिया आदि। समसामयिक आंदोलनों जैसे स्त्रीवाद, पर्यावरण, दलित स्वायत्तता, आदिवासी व मानव अधिकार आदि को अपने में समाहित न करना समाजवाद की विफलता के मुख्य कारण हैं।
तीसरे विषय वक्ता के रूप में अजीत झा ने प्रश्न किया कि आज अम्बेडकरवाद क्या है? ये राजनीतिक-सामाजिक प्रतिक्रियाएँ, विचारधाराएँ हैं, पर आज इसके कई हिस्से आरएसएस से जुड़े हुए हैं। आगे वे प्रश्न खड़े करते हैं कि, 1950 में गांधीवाद, समाजवाद या अम्बेडकरवाद का आरएसएस से कोई संबंध था क्या? गाँधी की मृत्यु के बाद गाँधीवादी परंपरा में भी जाति विनाश पर कोई काम नहीं हुआ, समाजवाद में आज जाति को लेकर जो नज़रिया है वो निस्संदेह लोहिया का नज़रिया है। जाति विनाश को लेकर सबसे महत्वपूर्ण बात कहते हैं कि जाति केवल राजनीतिक-आर्थिक रूप से नहीं खत्म होगी इसके लिए सामाजिक, सांस्कृतिक योजना भी बनानी पड़ेगी। आज के अम्बेडकरवादियों पर तंज कसते हुए वे कहते हैं कि आज के अम्बेडकरवादियों का अम्बेडकरवाद से कोई ताल्लुक नहीं है।
विशिष्ट वक्ता के तौर पर अली अनवर साहब ने कहा कि हिन्दू समाज की ही तरह आज मुस्लिम समाज में भी आज जाति जन्मना है और पसमांदा नाम की कोई जाति या धर्म मुस्लिम समाज में नहीं है। दरअसल पसमांदा दो शब्दों ‘पस’ और ‘मांदा’ को जोड़कर बना है जिसका अर्थ होता है- जो पीछे छूट गया और इसमें वही आएँगे जो पिछड़े हैं। आगे चर्चा में उन्होंने कहा कि पसमांदा मुस्लिमों पर विमर्श, जाति और जनसंघ की विचारधारा से आरएसएस के रिश्ते को मधु लिमये बेहतर समझते थे इसलिए बसपा को साथ लेकर जब भाजपा ने सरकार बनाई तब मधु हर आग्रह के बावजूद उसमें शामिल नहीं हुए।

वक्ताओं के अतिरिक्त आमंत्रित प्रतिभागियों में सबसे पहले शालिनी को विचार रखने के लिए आमंत्रित किया गया। विषय पर अपने विचार रखते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक महापुरुष का एक मिशन स्टेटमेंट होता है जिसमें उसके जीवन का दर्शन समाहित होता है जैसे कार्ल मार्क्स का ‘दुनिया का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है’, गाँधी का ‘हिन्द-स्वराज’ और डॉ आंबेडकर का ‘जातियों का विनाश’ जिसका उपाय उन्होंने धर्मांतरण सुझाया यानि बुद्ध का रास्ता। आगे उन्होंने प्रश्न किया कि, ‘समाजवादियों में जाति के विनाश के क्या विकल्प सुझाए गए, उसपर क्या और कैसे काम किया गया?’ साथ ही शालिनी ने डॉ आंबेडकर द्वारा मराठा मंदिर में दिया गया 23 मार्च 1947 के भाषण पर भी चर्चा की।
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कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व सांसद व विधायक पं. रामकिशन ने कहा कि जाति व्यवस्था कब बनी व कब शुरू हुई जैसे एतिहासिक चर्चाओं के अतिरिक्त इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि जाति व्यवस्था कहाँ कम हुई इस पर भी एक समानांतर शोध किया जाना चाहिए। उन्होंने माना कि वैवाहिक संबंधों के बिना जाति विनाश सम्भव नहीं और जगह-जगह जाति तोड़ो सम्मेलन आयोजित किए जाने चाहिए।

कार्यक्रम में 75 प्रतिशत से ज्यादा सहभागी शिक्षित नये युवा थे और वंचित समाज के शोधार्थी भी अच्छी संख्या में आये। आमंत्रित वक्ताओं के अतिरिक्त कुल 18 साथियों ने विभिन्न कोणों से विषय पर हस्तक्षेप किया। शालिनी, संजय जोठे, मीणा , प्रो. मृदुला, विश्वजीत रतौनिया, नीलम सर, शिवम शर्मा, डॉ. राहुल दास, वीरांगना वाहिनी की उषा विश्वकर्मा, स्पर्श यादव, भुवन आदि ने भी अपनी बात रखी।

