2027 में बीजेपी-सपा का गणित बिगाड़ेंगे ये छोटे दल, समझिए क्या है इनका सीक्रेट वोट बैंक
उत्तर प्रदेश की राजनीति में 403 विधानसभा सीटों पर कब्जा जमाकर सरकार बनाने के लिए 202 सीटों का जादुई आंकड़ा पार करना अनिवार्य होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कई बार सरकार महज 30 से 35% वोट शेयर के दम पर बन जाती है और सिर्फ 2 से 5% वोटों का यह मामूली अंतर ही पूरे चुनाव का पासा पलट देता है।
यही वजह है कि यूपी का चुनावी रण सिर्फ भारतीय जनता पार्टी बनाम समाजवादी पार्टी का सीधा मुकाबला नहीं रहता, बल्कि असली खेल उन क्षेत्रीय दलों का होता है जिनका प्रदेश स्तर पर भले ही दायरा सीमित हो, लेकिन कुछ चुनिंदा जिलों में उनकी ऐसी मजबूत पकड़ होती है जो किसी को भी सिंहासन पर बैठा सकती है और किसी का भी मुख्यमंत्री बनने का सपना चकनाचूर कर सकती है।
अपना दल (एस), निषाद पार्टी, सुभासपा, राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) और आजाद समाज पार्टी (एएसपी) जैसे दल 2027 के विधानसभा चुनाव में बड़े उलटफेर की पूरी तैयारी में हैं। आखिर इन दलों की ज़मीनी ताकत कितनी है और आने वाले चुनाव में ये बीजेपी और सपा के समीकरणों को कैसे प्रभावित करेंगे, आइए आंकड़ों और सियासी समीकरणों के जरिए पूरी कहानी को विस्तार से समझते हैं।
मार्जिन का खेल और 2 से 5% वोटों की ताकत
यूपी विधानसभा चुनाव के पिछले कुछ दशकों का ट्रेंड इस बात की गवाही देता है कि दर्जनों सीटों पर जीत और हार का फासला लाखों नहीं बल्कि महज कुछ सौ या एक-दो हजार वोटों का होता है। ऐसी स्थिति में 2 से 5 प्रतिशत अतिरिक्त वोट किसी भी सियासी गठबंधन को सीधा और बड़ा फायदा पहुंचा देते हैं।
यही कारण है कि ये छोटे दल पूरे प्रदेश में प्रभावशाली न होने के बावजूद अपने प्रभाव वाले इलाकों में चुनाव परिणाम को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखते हैं। हर छोटे दल की अपनी एक खास सामाजिक और क्षेत्रीय ताकत है।
उदाहरण के लिए अपना दल (एस) का मुख्य प्रभाव कुर्मी समाज के बीच माना जाता है, और इसका असर पूर्वांचल से लेकर मध्य उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर साफ दिखाई देता है। वहीं, निषाद पार्टी निषाद, मल्लाह, केवट और बिंद समुदाय के बीच गहरी पकड़ रखती है, जिसका असर गोरखपुर, महाराजगंज, संत कबीर नगर, प्रयागराज और उसके आसपास के जिलों में बखूबी नजर आता है।
पश्चिमी यूपी से पूर्वांचल तक इन दलों का है दबदबा
सुहेलभारतीय समाज पार्टी यानी सुभासपा का मुख्य आधार राजभर समाज है, और गाजीपुर, मऊ, बलिया, आजमगढ़ समेत पूर्वांचल के कई जिलों में इनकी भूमिका बेहद निर्णायक मानी जाती है। दूसरी ओर, राष्ट्रीय लोकदल (आरएलडी) पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट और किसान राजनीति का सबसे बड़ा चेहरा रही है, जहां मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली और आसपास के क्षेत्रों में इसका प्रभाव चुनावी नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।
इसके अलावा, आजाद समाज पार्टी (एएसपी) पश्चिमी यूपी के दलित युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाने में जुटी है, और साल 2024 के लोकसभा चुनाव में नगीना सीट पर मिली धमाकेदार जीत ने इसे एक नई राजनीतिक पहचान दिलाई है।
पिछले दो विधानसभा चुनावों के आंकड़ों की तुलना करें तो इन छोटे दलों का कद लगातार बढ़ा है। साल 2017 में जहां अपना दल (एस) ने 9, सुभासपा ने 4 और आरएलडी ने सिर्फ 1 सीट जीती थी, वहीं 2022 के चुनाव में अपना दल (एस) बढ़कर 12, निषाद पार्टी 6, सुभासपा 6 और आरएलडी 8 सीटों पर पहुंच गई। इन आंकड़ों से साफ है कि इन दलों की ताकत सिर्फ वोट शेयर तक सीमित नहीं है, बल्कि इनकी विधानसभा सीटों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
2027 में क्यों बढ़ गई है छोटे दलों की अहमियत
यदि इन सभी क्षेत्रीय दलों के प्रमुख सामाजिक आधार और वोट बैंक को आपस में जोड़कर देखा जाए, तो कई क्षेत्रों में इनका संयुक्त प्रभाव सीधे तौर पर 10 से 13% या उससे भी ज्यादा तक पहुंच सकता है। हालांकि, यह प्रभाव पूरे उत्तर प्रदेश में एक समान नहीं है, बल्कि अलग-अलग जिलों और विधानसभा सीटों पर इसका स्तर अलग-अलग है। यह वोट बैंक कई बार बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच हार-जीत का कड़ा फैसला तय करता है।
अगर ये दल किसी एक बड़े गठबंधन के साथ मजबूती के साथ खड़े रहते हैं, तो उस गठबंधन को इसका भारी लाभ मिलता है। लेकिन अगर ये अलग-अलग मैदान में उतरते हैं, तो त्रिकोणीय मुकाबलों में वोटों का यह बिखराव पूरी चुनावी तस्वीर को रातों-रात बदल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सत्ताधारी दल के लिए ऐसे सहयोगी पूर्वांचल और अन्य इलाकों में सामाजिक संतुलन साधने में बहुत मददगार साबित होते हैं, जबकि विपक्षी दल भी अपने सामाजिक दायरे को विस्तार देने के लिए इन क्षत्रपों को साधने में जुटे रहते हैं।
क्या सिर्फ छोटे दल ही तय करेंगे यूपी की सियासत का भविष्य
यह मान लेना पूरी तरह सही नहीं होगा कि केवल छोटे दल ही चुनाव का अंतिम नतीजा तय करेंगे। उत्तर प्रदेश में चुनाव बेहद जटिल होते हैं, जो मजबूत उम्मीदवारों, स्थानीय मुद्दों, सांगठनिक ताकत, नेतृत्व, जातीय समीकरणों और चुनाव के समय बनने वाले माहौल जैसे तमाम कारकों से गहराई से प्रभावित होते हैं। इसके बावजूद, यदि मुकाबला कांटे का और बेहद करीबी हुआ, तो कुछ फीसदी वोट की ताकत रखने वाले ये क्षेत्रीय दल ‘किंगमेकर’ की निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
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सच तो यह है कि यूपी की राजनीति में कोई भी छोटा दल हमेशा छोटा नहीं रहता। 403 सीटों की इस विशाल विधानसभा की जंग में कई बार महज 2 से 5 प्रतिशत वोट ही सरकार बनाने या गिराने की इबारत लिख देते हैं, और यही वजह है कि अपना दल, निषाद पार्टी, सुभासपा, आरएलडी और आजाद समाज पार्टी जैसे दल साल 2027 के सबसे बड़े राजनीतिक रहस्य और पहेली बन चुके हैं।

