पेपर लीक माफिया की कमर तोड़ने आया नया ‘ब्रह्मास्त्र’, क्या नए कानून से लौटेगा लाखों छात्रों का भरोसा
देश भर में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले पेपर लीक माफिया पर नकेल कसने के लिए आखिरकार कानून को और सख्त कर दिया गया है। वक्त की मांग को देखते हुए पुराने नियमों में संशोधन का यह कदम स्वागत योग्य है। नए कानून के तहत दोषियों को अधिकतम 10 साल की जेल और 10 करोड़ रुपये तक के भारी-भरकम जुर्माने का प्रावधान किया गया है। केंद्र सरकार का यह फैसला भविष्य में विद्यार्थियों के हितों की रक्षा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है।
पिछले दो वर्षों के भीतर देश के अलग-अलग राज्यों से 100 से अधिक छोटी-बड़ी परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक होने की घटनाएं सामने आई हैं। यह आंकड़े साफ बताते हैं कि गैरकानूनी तरीके से करोड़ों रुपये ऐंठने वाला यह माफिया सिंडिकेट पूरे देश में किस कदर अपनी जड़ें जमा चुका है। चंद पैसों के लालच में यह सिंडिकेट उन लाखों छात्र-छात्राओं और उनके माता-पिता के संघर्ष को दरकिनार कर देता है, जो दिन-रात एक करके परीक्षा की तैयारी करते हैं।
सख्त कानून के साथ-साथ प्रभावी मॉनिटरिंग और तुरंत सजा है जरूरी
महज सख्त कानून बना देने से यह गोरखधंधा अचानक खत्म नहीं होने वाला। कानून की असली ताकत उसके प्रभावी कार्यान्वयन में निहित है। सरकार को समय-समय पर इसकी कड़ी निगरानी करनी होगी और भविष्य में यदि ऐसा कोई मामला सामने आता है, तो दोषियों को बिना किसी देरी के कड़ी से कड़ी सजा दिलानी होगी।
भारत में लंबे समय से यह आम धारणा बन चुकी है कि कोई भी अपराध करने के बाद रसूख, पैसे और कानूनी दांव-पेच के दम पर बचा जा सकता है। समाज और देश के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले तत्वों के मन में नए कानून का खौफ पैदा करने के लिए इस धारणा को तोड़ना सबसे पहली प्राथमिकता होनी चाहिए।
एंड-टू-एंड डिजिटल ट्रैकिंग और परीक्षा केंद्रों का सुरक्षा ऑडिट अनिवार्य
प्रश्नपत्रों की सुरक्षा में सेंध लगाना सिर्फ एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि युवाओं के समय, आर्थिक संसाधनों और उनके सपनों पर सीधा हमला है। लगातार सामने आए मामलों ने साबित कर दिया है कि यह समस्या किसी एक व्यक्ति तक सीमित न होकर पूरी व्यवस्था से जुड़ी है। ऐसे में शिक्षा मंत्रालय के सामने सबसे बड़ी चुनौती परीक्षा प्रणाली में छात्रों का खोया हुआ विश्वास वापस लौटाना है।
इसके लिए केवल दोषियों की गिरफ्तारी काफी नहीं होगी। एक ऐसा फुल-प्रूफ सिस्टम तैयार करना होगा, जिसमें:
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प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा केंद्र तक एंड-टू-एंड सुरक्षा और डिजिटल ट्रैकिंग हो।
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परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों का नियमित स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट कराया जाए।
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गड़बड़ी होने पर जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय हो।
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मामलों की समयबद्ध जांच और रिपोर्ट को सार्वजनिक किया जाए।
उद्देश्य ऐसा ढांचा खड़ा करने का होना चाहिए, जहां पेपर चोरी करना लगभग नामुमकिन हो और पकड़े जाने का डर 100 प्रतिशत हो।
राजनीतिक जवाबदेही और परीक्षा व्यवस्था में दीर्घकालिक सुधारों की मांग
इस पूरे मुद्दे पर जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन और विपक्ष के कड़े रुख ने सरकार पर भारी राजनीतिक दबाव बनाया। संसद के मानसून सत्र में घिरी सरकार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा नैतिक उत्तरदायित्व के साथ-साथ एक राजनीतिक क्षति-नियंत्रण (डेमेज कंट्रोल) का कदम माना गया।
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मंत्री के इस्तीफे से सरकार को तात्कालिक राहत तो मिल गई है, लेकिन जनमानस और छात्रों में सरकार की छवि किसी इस्तीफे से नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में दिखने वाले ठोस धरातलीय सुधारों से ही सुधरेगी। अब असल कसौटी नए सख्त कानून के कड़ाई से पालन और अभेद्य परीक्षा प्रणाली को लागू करने की है।

