अपनी ही अवाम का कातिल बना ये देश, 76 हजार मौतों पर फौज का जुल्म देख सन्न रह गई पूरी दुनिया
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (केपी) प्रांत से जो आंकड़े सामने आए हैं, वे किसी भी इंसान की रूह कंपा देने के लिए काफी हैं। वहां 76 हजार से ज्यादा बेकसूर नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया गया है और साढ़े छह हजार से अधिक लोग लापता हैं। इसके अलावा 35 हजार दुकानें और ढाई लाख मकान पूरी तरह तबाह कर दिए गए हैं। रोटी-रोजगार का साधन छिन जाने के बाद आज वहां के लोगों के सिर पर हर वक्त मौत का साया मंडरा रहा है। पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों के अमानवीय चेहरे ने एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने उसकी पोल खोल दी है, जिससे पश्तून समुदाय पर हो रहे अत्याचारों का काला सच उजागर हो गया है।
मंजूर पश्तीन ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर खोली पाकिस्तान की पोल
पश्तून तहफ्फुज मूवमेंट (पीटीएम) के प्रमुख मंजूर पश्तीन ने अंतरराष्ट्रीय अदालत में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसियों की बर्बरता को बेनकाब कर दिया है। उन्होंने दुनिया का ध्यान इस ओर खींचा है कि कैसे केपी प्रांत की प्राकृतिक खनिज संपदा और बहुमूल्य संसाधनों को लूटने के लिए सेना ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दी हैं। जान और पेट की भूख मिटाने के लिए बड़ी संख्या में पश्तूनों को अपना घर-बार छोड़कर पलायन करना पड़ा है, जबकि जो लोग पीछे छूट गए हैं वे आज भी हर पल संघर्ष करने को मजबूर हैं।
लोकतंत्र सिर्फ दिखावा, सेना और आईएसआई के इशारे पर चलता है देश
पाकिस्तान में लोकतंत्र केवल नाममात्र का है और सेना तथा खुफिया एजेंसी आईएसआई के सामने बोलने की हिम्मत किसी में नहीं है। वहां के तमाम राजनीतिक दल फौज के हाथों की कठपुतली बने हुए हैं। खैबर पख्तूनख्वा के अलावा बलूचिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में सेना की मनमानी जगजाहिर है। इसके बावजूद वैश्विक मंचों पर इस पर खामोशी छाई रहती है। भू-राजनीतिक समीकरणों के तहत ऐसे हालातों पर दुनिया के कई ताकतवर देशों की चुप्पी ने मानवाधिकारों के दावों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
डूरंड लाइन का विवाद और अफगानिस्तान से जुड़े भू-राजनीतिक तार
भौगोलिक नजरिए से खैबर पख्तूनख्वा सिर्फ पाकिस्तान के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दक्षिण एशिया की राजनीति का एक अत्यंत संवेदनशील केंद्र है, जिसके तार सीधे तौर पर पड़ोसी देश अफगानिस्तान से जुड़े हैं। इस प्रांत की पश्चिमी सीमा जिस रेखा से सटी है, उसे डूरंड लाइन कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी जटिलता यह है कि अफगानिस्तान की कोई भी सरकार, चाहे वह अतीत के निजाम रहे हों या वर्तमान का तालिबान शासन, इसे वैध अंतरराष्ट्रीय बॉर्डर के रूप में मान्यता नहीं देती है, जिससे यह क्षेत्र हमेशा तनाव की आग में सुलगता रहता है।
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इमरान खान की पार्टी और गवर्नर शासन से गहराया राजनीतिक संकट
सुरक्षात्मक चुनौतियों के बीच खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान की घरेलू राजनीतिक उठापटक का भी सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पीटीआई (PTI) का इस क्षेत्र में बेहद मजबूत जनाधार रहा है, जो अक्सर केंद्रीय हुकूमत और ताकतवर सैन्य तंत्र के फैसलों के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है। मौजूदा शहबाज शरीफ सरकार द्वारा इस प्रांत में गवर्नर शासन और आपात जैसे हालात पैदा किए जाने के बाद स्थिति और ज्यादा गंभीर हो गई है, जिससे सेना और खुफिया तंत्र को यहां अलोकतांत्रिक तरीके से फैसले लेने की खुली छूट मिल गई है।

