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अखिलेश यादव के चक्रव्यूह में घिरे राजा भैया, सपा की नई चाल से गरमाई प्रतापगढ़ की सियासत

उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है। इस बार सबसे बड़ा सियासी घमासान प्रतापगढ़ जिले के कुंडा और बाबागंज इलाके में देखने को मिल रहा है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कुंडा के बाहुबली विधायक और जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के प्रमुख रघुराज प्रताप सिंह उर्फ ‘राजा भैया’ के मजबूत सियासी किले में सेंध लगाने के लिए खास चक्रव्यूह तैयार किया है। सपा की इस आक्रामक घेराबंदी ने पूर्वांचल से लेकर लखनऊ तक का राजनीतिक तापमान अचानक बढ़ा दिया है।

कुंडा में तीन दशक पुराना दबदबा और 2022 का कड़ा मुकाबला

साल 1993 से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में अपनी सियासी पारी शुरू करने वाले रघुराज प्रताप सिंह लगातार चुनाव जीतते आए हैं। तीन दशकों से कुंडा सीट राजा भैया का अजेय दुर्ग मानी जाती रही है। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने राजा भैया के ही कभी करीबी रहे गुलशन यादव को सपा का टिकट देकर मुकाबले को बेहद कड़ा और चर्चा का केंद्र बना दिया था। उस चुनाव में राजा भैया को 99,612 वोट मिले, जबकि गुलशन यादव ने 69,297 वोट हासिल किए थे। राजा भैया 30,315 मतों के अंतर से विजयी तो रहे, लेकिन सपा ने उनके गृह क्षेत्र में वोट बैंक का एक नया आधार खड़ा कर दिया।

शैलेंद्र और केशव पासी की एंट्री से गरमाया समीकरण

अब 2027 के महामुकाबले के लिए सपा प्रमुख ने अपनी रणनीति में नए और प्रभावशाली चेहरों को शामिल किया है। पूर्व सांसद शैलेंद्र पासी और भाजपा के पूर्व प्रत्याशी केशव पासी के समाजवादी पार्टी में शामिल होने को इसी घेराबंदी की अहम कड़ी माना जा रहा है। शैलेंद्र पासी की गिनती कभी राजा भैया के बेहद नजदीकियों में होती थी, जबकि केशव पासी की स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ है। सपा नेतृत्व इन दोनों नेताओं के जरिए इलाके के पासी समाज और दलित वोट बैंक को पार्टी के पाले में लाने की तैयारी में जुटा है।

बाबागंज सीट पर PDA फॉर्मूले की अग्निपरीक्षा

सियासी जानकारों का मानना है कि असली लड़ाई सिर्फ कुंडा तक सीमित नहीं है, बल्कि उससे सटी बाबागंज (सुरक्षित) विधानसभा सीट भी इस बार केंद्र में है। 2022 में जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के विनोद कुमार ने 67,282 वोट पाकर जीत दर्ज की थी, जबकि सपा के गिरीश चंद्र 51,515 वोट लेकर दूसरे स्थान पर रहे थे। अब केशव पासी के सपा में आने और शैलेंद्र पासी के प्रभाव से सपा यहां अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को पूरी मजबूती से लागू करने में लगी है। यदि यह सामाजिक समीकरण जमीन पर उतरा, तो जनसत्ता दल के पारंपरिक वोट बैंक के सामने कड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है।

2018 के राज्यसभा चुनाव से बढ़ी थी तल्खी

अखिलेश यादव और राजा भैया के रिश्तों में कड़वाहट का इतिहास 2018 के राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है। उस वक्त सपा ने बसपा उम्मीदवार भीमराव अंबेडकर का समर्थन किया था, लेकिन राजा भैया ने बसपा प्रत्याशी के बजाय भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में क्रॉस वोटिंग कर दी थी। इसके तुरंत बाद दोनों नेताओं की राहें पूरी तरह जुदा हो गईं और राजा भैया ने अपनी नई पार्टी ‘जनसत्ता दल लोकतांत्रिक’ का गठन कर लिया।

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2027 के लिए बदलती चुनावी बिसात

सपा के इस ताजा दांव से यह साफ हो गया है कि कुंडा और बाबागंज का मुकाबला अब महज दो विधानसभा सीटों का नहीं, बल्कि पूर्वांचल की बड़ी सियासी लड़ाई का हिस्सा बन चुका है। पासी समाज के रुख, स्थानीय जातीय गठजोड़ और भाजपा की आगामी रणनीति पर पूरे प्रदेश की निगाहें टिकी हैं। क्या अखिलेश यादव का यह नया चक्रव्यूह राजा भैया के तीन दशक पुराने दुर्ग को हिला पाएगा, यह आने वाला वक्त ही तय करेगा।

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