बांग्लादेश में फिर होगा खूनी तख्तापलट? सड़कों पर जंग का ऐलान, गृहयुद्ध के मुहाने पर पहुंचा पड़ोसी मुल्क
भारत का पड़ोसी देश बांग्लादेश एक बार फिर गंभीर राजनीतिक अशांति और गृहयुद्ध जैसे हालात के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है। देश में बनी नई प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ विपक्षी दल नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) ने सीधे तौर पर जंग का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने वर्तमान तारिक रहमान सरकार के गृह मंत्री और ऊर्जा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर देशव्यापी सड़क आंदोलन की खुली चेतावनी जारी की है।
कभी शेख हसीना सरकार के तख्तापलट की अगुवाई करने वाले पूर्व छात्र नेता और अब एनसीपी प्रमुख नाहिद हसन ने प्रधानमंत्री तारिक रहमान को सीधा ‘तानाशाह’ करार देते हुए राजधानी ढाका समेत प्रमुख शहरों में युवाओं को गोलबंद करना शुरू कर दिया है। नाहिद हसन के इस आक्रामक रुख और भारत विरोधी बयानों ने दक्षिण एशियाई कूटनीतिक हलकों में बेचैनी बढ़ा दी है।
ढाका की सड़कों पर नए तख्तापलट की बिसात और हसीना की वापसी का डर
ढाका के सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि नेशनल सिटीजन पार्टी एक बार फिर व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर व्यापक अराजकता फैलाने की फिराक में है। लगभग सवा दो साल पहले छात्र आंदोलनों की आड़ में भड़की हिंसा के चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख हसीना को अचानक देश छोड़ना पड़ा था और तब से वे भारत में शरण लिए हुए हैं। अब राजनीतिक हलकों में यह सुगबुगाहट तेज हो गई है कि शेख हसीना दिसंबर तक बांग्लादेश लौट सकती हैं। उनकी संभावित वापसी की खबर ने वर्तमान सत्ता पक्ष और विपक्षी दलों दोनों के पसीने छुड़ा दिए हैं।
राजनीतिक विरोधियों को आशंका है कि हसीना की धरती पर मौजूदगी अवामी लीग के लाखों समर्थकों को फिर से एकजुट कर सकती है, जिससे मौजूदा अंतरिम और राजनीतिक समीकरण पूरी तरह ध्वस्त हो सकते हैं।
आर्थिक कंगाली की कगार पर देश, वर्ल्ड बैंक ने भी जताई गहरी चिंता
सत्ता में बदलाव के बावजूद बांग्लादेश की आम जनता को महंगाई, बेरोजगारी और रोजमर्रा के संकटों से कोई राहत नहीं मिल सकी है। विकास दर के मामले में कभी दक्षिण एशिया का सबसे तेजी से उभरता देश माना जाने वाला बांग्लादेश आज बदहाल आर्थिक दौर से गुजर रहा है। विश्व बैंक समेत कई वैश्विक वित्तीय संस्थाएं ढाका की खस्ताहाल वित्तीय स्थिति, घटते विदेशी मुद्रा भंडार और चरमराती बैंकिंग व्यवस्था पर गंभीर चिंता जाहिर कर चुकी हैं। कानून व्यवस्था पूरी तरह पटरी से उतर चुकी है और प्रशासनिक ढांचा कमजोर पड़ने से आम नागरिकों का भरोसा सरकार से उठता जा रहा है।
भारत के साथ सीमा सुरक्षा का संकट और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक दबाव
बांग्लादेश की आंतरिक उथल-पुथल का सीधा असर भारत के साथ उसके कूटनीतिक और रणनीतिक रिश्तों पर पड़ रहा है। सीमा पार तस्करी, घुसपैठ, अवैध प्रवासन और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हिंदू आबादी व मंदिरों पर लगातार हुए हमलों को लेकर नई दिल्ली और ढाका के बीच तल्खी बरकरार है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डिफेंस पैक्ट के दबाव और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण ने मामले को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।
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अवामी लीग के प्रभावहीन होने से देश में बने राजनीतिक शून्य का फायदा उठाकर कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी और बीएनपी जैसी ताकतें तेजी से जमीन तलाश रही हैं। जानकारों का मानना है कि बांग्लादेश को स्थायी शांति की राह पर लाने के लिए सबसे पहले एक निष्पक्ष और मजबूत चुनाव आयोग का गठन कर पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रक्रिया बहाल करनी होगी, वरना यह राजनीतिक शून्य देश को लंबे गृहयुद्ध में धकेल सकता है।

