उत्तर प्रदेश

प्रतिस्पर्धा एवं शिक्षा व्यवस्था का भावनात्मक दिवालियापन

अमित कुमार यादव

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा गुलामी की मानसिकता से मुक्ति यानि सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था एवं चिंतन परम्परा का डिकॉलोनाइज़ेशन का एजेण्डा कितना आवश्यक है यह एक सप्ताह के भीतर घटित घटनाओं ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है। बीते एक सप्ताह के भीतर घटित दो अत्यंत विचलित कर देने वाली घटनाओं ने भारतीय सार्वजनिक चेतना को गहरे स्तर पर झकझोर दिया है।जिसमें पहली घटना उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की है, जहाँ एक इक्कीस वर्षीय छात्र पर अपने पिता की हत्या कर शव को एक ड्रम में छिपाने का आरोप लगा। दूसरी घटना मध्यप्रदेश के सीधी से संबंधित है, जहाँ बारहवीं कक्षा का एक मेधावी छात्र, जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा था और अपने क्षेत्र में टॉपर के रूप में प्रतिष्ठित था, अपने पूरे परिवार की हत्या के आरोप में सामने आया। यह तथ्य विशेष रूप से विचलित करने वाला है कि जिस युवक को पारंपरिक अर्थों में शैक्षणिक उत्कृष्टता, अनुशासन और उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षा का प्रतीक माना जाता था, वही हिंसक विघटन का केंद्र बन गया।

शिक्षा के विषय में “या विद्या सा विमुक्तये” जैसे दर्शन वाले भारतीय समाज में ऐसी घटनाओं का घटित होना मात्र आपराधिक प्रसंग नहीं, बल्कि गहन नैतिक एवं सामाजिक भी प्रश्न है। भारत जैसे समाज में, जहाँ परिवार भावनात्मक, सांस्कृतिक और नैतिक आधार पर निर्मित इकाई माना जाता है, जहाँ धार्मिक एवं दार्शनिक ग्रंथ कर्तव्य, संबंधों की पवित्रता और संयम पर बल देते हैं, वहाँ इस प्रकार की घटनाएँ केवल व्यक्तिगत विचलन के रूप में नहीं देखी जा सकतीं। वे हमारे सामाजिक ताने-बाने में उपस्थित किसी गहरे असंतुलन की ओर संकेत करती हैं। अतः यह अनिवार्य हो जाता है कि हम विद्यार्थी अभिभावक संबंधों की बदलती प्रकृति, शिक्षा व्यवस्था की संरचना, उसके मूल्यों और उसके घोषित उद्देश्यों की समीक्षा करें।

प्रथम दृष्टया इन घटनाओं को मनोवैज्ञानिक विकार या व्यक्तिगत मानसिक विघटन के रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है; किन्तु ऐसा करना विश्लेषणात्मक रूप से अपर्याप्त होगा। प्रसिद्ध समाजशास्त्री दुर्ख़ीम ने स्पष्ट किया है कि जो क्रियाएँ अत्यंत निजी प्रतीत होती हैं, वे भी व्यापक “सामाजिक तथ्य” की अभिव्यक्ति होती हैं। उनकी “अनोमी” की अवधारणा जो तीव्र सामाजिक परिवर्तन से उत्पन्न नैतिक दिशाहीनता को निरूपित करती है, जो आज के प्रतिस्पर्धी समाज में युवाओं की भावनात्मक अस्थिरता को समझने में अत्यंत प्रासंगिक है। जब सामाजिक अपेक्षाएँ तीव्र होती जाती हैं और सहारा देने वाली सामुदायिक संरचनाएँ क्षीण होती हैं, तब आकांक्षाओं और जीवन-यथार्थ के बीच एक खतरनाक खाई उत्पन्न हो जाती है। भारत की शिक्षा व्यवस्था नवउदार पाश्चात्य प्रतिस्पर्धी ढाँचे में अंतर्निहित होने के कारण शैक्षणिक प्रदर्शन अब केवल मूल्यांकन का साधन नहीं रहा; वह सामाजिक गतिशीलता, पारिवारिक सम्मान और आर्थिक सुरक्षा की प्रतीकात्मक मुद्रा बन चुका है।

मानकीकृत परीक्षाएँ, कोचिंग उद्योग, रैंकिंग तंत्र और प्रदर्शन विश्लेषण ने शिक्षा को उच्च-दांव वाली प्रतिस्पर्धात्मक परियोजना में रूपांतरित कर दिया है। इस व्यवस्था में छात्र प्रतिस्पर्धा की तर्कशास्त्र को आत्मसात कर लेते हैं और स्वयं को निरंतर तुलना की कसौटी पर मापते रहते हैं। यह संरचनात्मक परिवर्तन उत्तराधुनिकतावादी विचारक फूको की “अनुशासनात्मक सत्ता” की अवधारणा से सामंजस्य रखता है, जिसे उन्होंने अपनी कृति डिस्प्लिन एंड पनिशमेंट में प्रतिपादित किया। फूको के अनुसार आधुनिक संस्थाएँ निगरानी, सामान्यीकरण और परीक्षा की प्रक्रियाओं के माध्यम से “अनुशासित शरीर” का निर्माण करती हैं।

परीक्षा केवल ज्ञान का परीक्षण नहीं, बल्कि पहचान-निर्माण का उपकरण बन जाती है। छात्र स्वयं को अंकों, प्रतिशतों और रैंकों के माध्यम से देखने लगते हैं; बाहरी नियंत्रण आत्म-नियंत्रण में परिवर्तित हो जाता है। जब मूल्यांकन मात्रात्मक सूचकांकों तक सीमित हो जाए, तब असफलता केवल एक परिस्थिति नहीं रहती वह अस्तित्वगत संकट का रूप ले लेती है। यहाँ तक कि उच्च उपलब्धि प्राप्त करने वाले छात्र भी “स्थिति-रक्षण की चिंता” से ग्रस्त हो सकते है, इस प्रकार शैक्षणिक सफलता मानसिक संतुलन की गारंटी नहीं देती; बाहरी उत्कृष्टता और आंतरिक विघटन साथ-साथ विद्यमान रह सकते हैं।

इस भावनात्मक संकट को एरिक फॉम की कृति द सेन सोसाइटी के आलोक में भी समझा जा सकता है। फ्रॉम ने “होने” और “रखने” के अस्तित्वगत रूपों में अंतर किया। “रखने” पर आधारित समाज में व्यक्ति स्वयं को प्रमाणपत्रों, पदों और प्रतिष्ठा से परिभाषित करता है। बाज़ार-तर्क से संचालित शिक्षा व्यवस्था छात्रों को प्रमाणपत्रों के वाहक में बदलने का जोखिम उठाती है, न कि आत्म-चिंतनशील व्यक्तित्व में। इसी प्रकार पाउलो फ्रेयर ने अपनी प्रसिद्ध कृति पेड़ागॉजी ऑफ द ऑप्रेस्ड में “बैंकिंग मॉडल” की आलोचना करते हुए कहा कि जब शिक्षा को केवल ज्ञान-जमा की प्रक्रिया बना दिया जाता है, तब वह आलोचनात्मक चेतना को अवरुद्ध कर देती है।

भारतीय संदर्भ में शिक्षा अति-सक्रिय और प्रतिस्पर्धी अवश्य है, परंतु वह विद्यार्थियों को मापनीय उत्पादन के रूप में देखने की प्रवृत्ति से मुक्त नहीं है। भावनात्मक साक्षरता, संवादात्मक सहभागिता और नैतिक विमर्श परीक्षा-केंद्रित दबावों में हाशिए पर चले जाते हैं। परिवार, जिसे पारंपरिक रूप से भावनात्मक आश्रय-स्थल माना गया है, लेकिन इस संरचनात्मक दबाव से वह भी अछूता नहीं है। पियरे बॉर्डियू के अनुसार परिवार केवल स्नेह का स्थल नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पूँजी के संचार का माध्यम भी है। शैक्षणिक पूँजी अर्जित करने की तीव्र आकांक्षा पारिवारिक संबंधों को अनजाने में मूल्यांकनात्मक बना सकती है। जब संवाद अंकों और रैंक तक सीमित हो जाए, तब निकटता की जगह प्रदर्शन का दबाव ले लेता है।

पाश्चात्य नवउदारवादी व्यवस्था में व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का महिमामंडन संरचनात्मक असमानताओं को अदृश्य कर देता है। इस प्रवृत्ति का विश्लेषण ब्युंग-चुल हान ने अपनी कृति द बर्नाउट सोसायटी में किया है, जहाँ वे बताते हैं कि समकालीन व्यक्ति बाहरी दमन का नहीं, बल्कि आत्म-शोषण का शिकार है। उपलब्धि केन्द्रित व्यक्ति स्वयं ही स्वामी और दास दोनों बन जाता है। “भावनात्मक दिवालियापन” का अर्थ भावनाओं का अभाव नहीं, बल्कि नीतिगत स्तर पर भावनात्मक कल्याण के अवमूल्यन से है। शैक्षणिक संस्थानों में परामर्श सेवाएँ सीमित हैं; मानसिक स्वास्थ्य अब भी सामाजिक कलंक से घिरा है; शिक्षक प्रशासनिक और पाठ्यभार से दबे हैं। परिणामस्वरूप, छात्र “मौन-सहनशीलता” की संस्कृति में ढल जाते हैं, जहाँ पीड़ा व्यक्त करना कमजोरी समझा जाता है।

यद्यपि हिंसक घटनाओं में जटिल मनोवैज्ञानिक और परिस्थितिजन्य कारक भी सम्मिलित होते हैं, तथापि संरचनात्मक कारणों की अनदेखी समाधान का मार्ग नहीं खोलती। शिक्षा-दर्शन हमें वैकल्पिक दृष्टि प्रदान करता है। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शिक्षा को बौद्धिक, नैतिक और सौंदर्यात्मक विकास की समन्वित प्रक्रिया के रूप में देखा इसी प्रकार जॉन डीवी ने भी शिक्षा को लेकर लोकतांत्रिक सहभागिता और अनुभवात्मक अधिगम पर बल दिया। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल दक्ष कर्मी नहीं, बल्कि विचारशील नागरिक तैयार करना था।

इसलिए इस बहुस्तरीय समस्या का समाधान भी बहुस्तरीय होना चाहिए। शासन-स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रतिपादित अगले दस वर्षों में “ग़ुलामी की मानसिकता से मुक्ति” का आह्वान आत्म-विश्वास और सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की दिशा में एक संकल्प प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही सामाजिक स्तर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा प्रतिपादित “पंचपरिवर्तन” कार्यक्रम में संघ प्रमुख डॉ मोहन भागवत का “कुटुंब प्रबोधन” की संकल्पना जिसमें परिवार के सामूहिक संवाद और चिंतन पर बल दिया जाना भावनात्मक पुनर्संवाद की दिशा में एक पहल के रूप में देखी जा सकती है।

इसके साथ ही संस्थागत स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को शिक्षा के केन्द्रीय ढाँचे में एकीकृत किया जाना चाहिए। शिक्षक-प्रशिक्षण में भावनात्मक साक्षरता और संघर्ष-संवेदनशीलता को सम्मिलित करना होगा। पाठ्यक्रमों में सहयोगात्मक अधिगम और चिंतनशील अभ्यासों को स्थान देना होगा। परिवारों को भी सहयोगी आकांक्षा और दमनकारी अपेक्षा के बीच अंतर समझना होगा। मीडिया द्वारा “टॉपर संस्कृति” का अत्यधिक महिमामंडन सफलता की संकीर्ण परिभाषा को पुष्ट करता है जिसे कम करना होगा। रचनात्मकता, नैतिक प्रतिबद्धता, व्यावसायिक कौशल और नागरिक भागीदारी को समान सामाजिक मान्यता देना समय की माँग है।

अंततः, लखनऊ और सीधी की घटनाएँ अपवाद मात्र नहीं मानी जानी चाहिए, वे प्रतिस्पर्धा-चालित शिक्षा व्यवस्था के भीतर अंतर्निहित तनावों की ओर संकेत करती हैं। फ्रॉम का कथन स्मरणीय है यदि लाखों लोग समान दोष साझा करते हैं, तो वह दोष गुण नहीं बन जाता। सामान्यीकृत दबाव उसे निरापद नहीं बनाता। भारतीय समाज के समक्ष चुनौती यह है कि वह उत्कृष्टता को सहानुभूति से, प्रतिस्पर्धा को संवेदना से और महत्वाकांक्षा को नैतिक प्रामाणिकता से जोड़े। अन्यथा शिक्षा व्यवस्था सफल अभ्यर्थी तो उत्पन्न कर सकती है, परंतु संतुलित और समग्र व्यक्तित्व नहीं। यदि शिक्षा को “विमुक्ति का साधन” बने रहना है, तो उसे अपने नैतिक एवं भावनात्मक आधारों का पुनर्संयोजन करना ही होगा अन्यथा सफलता के आँकड़ों के पीछे छिपा मानवीय संकट बार-बार हमारे सामाजिक विवेक को चुनौती देता रहेगा।

(लेखक जेएनयू में राजनीतिक विज्ञान के शोधार्थी हैं. ये उनके निजी विचार हैं.)

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