एक पेशेंट के लिए रेबीज़ का पैकेट खोलने से इनकार, आगरा CMO कार्यालय का ग़ैर ज़िम्मेदाराना बयान
राही दहरिया
आगरा। सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर संवेदनहीनता और बदइंतजामी का आलम थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला बीती 26 दिसम्बर, बोदला क्षेत्र के देहतोरा मोड़ पर स्थित सरकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का है। जहाँ डॉक्टर और नर्स सहित अधिकांश स्टाफ़ नदारद मिला। जिसके चलते एक 10-12 वर्षीय बच्चा रेबीज़ के इंजेक्शन के लिए अपने परिजन के साथ एक स्वास्थ्य केन्द्र से दूसरे स्वास्थ्य केन्द्र पर भटकता मिला। उपस्थित महिला कर्मी द्वारा परिजन के साथ असंवेदनशील व्यवहार करने के साथ-साथ उपचार में भी असंवेदनशीलता देखने को मिली।
जानकारी माँगे जाने पर अधिकाँश स्टाफ़ और स्वास्थ्य केन्द्र के लिए नियुक्त एक मात्र नर्स भी दूसरे स्वास्थ्य कार्यक्रम के कारण अनुपस्थित मिली। दूसरे कर्मी से इंजेक्शन लगाने के लिए, परिजन द्वारा आग्रह किये जाने पर, महिला स्टाफ़ ने कहा, “तो उन्हीं से पूछ लो, मेरा क्यों ख़ून पी रहे हो फिर?” इस असंवेदनशील टिप्पणी पर व्यक्ति ने कड़ा विरोध जताया।
व्यवहार के साथ-साथ उपचार किये जाने को लेकर भी स्वास्थ्य केन्द्र से लेकर सीएमओ कार्यालय तक अंसवेदनशीलता देखने को मिली। स्वास्थ्य केन्द्र पर महिला कर्मी द्वारा कहा गया “अगर नर्स होती भी तो भी एक (पेशेंट) के लिए इंजेक्शन की डोज़ नहीं खोली जाती।” एक से ज़्यादा पेशेंट होते हैं तभी पैकेट को खोला जाता है। मौजूद मेल स्टाफ़ द्वारा भी एक मरीज़ के लिए पैकेट को न खोलने की असमर्थता जताई गयी। पीड़ित बच्चे को बिचपुरी स्थित स्वास्थ्य केन्द्र ले जाने के लिए कहा गया, जबकि उसे आवास विकास सेक्टर-1 स्थित स्वास्थ्य केन्द्र से देहतोरा स्थित स्वास्थ्य केन्द्र पर भेजा गया था। परिजन ने रोष जताया कि 25 दिसम्बर को स्वास्थ्य केन्द्रों पर अवकाश के चलते दूसरा इंजेक्शन भी निर्धारित दिन पर नहीं दिया सका था। अगर किसी कारणवश बिचपुरी स्वास्थ्य केन्द्र पर भी बच्चे को इंजेक्शन नहीं लगाया जा सका तो वह क्या करेगा? इसके अलावा महिला कर्मी द्वारा रेबीज़ का इंजेक्शन मंगलवार को लगाए जाने की बात भी कही गयी, जबकि 26 दिसम्बर को शुक्रवार का दिन था।
इस लापरवाही के सम्बन्ध में सीएमओ कार्यालय, आगरा से सम्पर्क करने पर भी एक मरीज़ के लिए इजेंक्शन के पैकेट को न खोले जाने की बात दोहरायी गयी।
रेबीज़ की गम्भीरता को देखते हुए जहाँ एक ओर कई राज्यों में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं, कुत्तों की धड़-पकड़ की जा रही है, बन्दरों और आवारा कुत्तों का टीकाकरण किया जा रहा है, वहीं व्यवहारिक रूप से स्वास्थ्य केन्द्रों और सीएमओ कार्यालय पर डॉग बाइट के उपचार को लेकर ऐसी लापरवाहियाँ सामने आना, स्वास्थ्य विभाग पर गम्भीर प्रश्न खड़ा करता है। कभी स्टाफ़ के न होने की वजह से या कभी महंगा इंजेक्शन होने की वजह से ज़रूरतमन्द पीड़ितों के जीवन को भाग्य भरोसे पर छोड़ दिया जा रहा है।
बता दें, डॉग बाइट के मामले में रेबीज़ के इंजेक्शन के लिए 30 से 40 घण्टे का समय होता है। लेकिन घाव की गम्भीरता के अनुसार जितनी जल्दी डोज़ दे दी जाती है, रेबीज़ होने की सम्भावना उतनी ही कम रहती है। ऐसे में, क्या डॉग बाइट के केस में भी तत्काल इलाज के बजाय स्वास्थ्य केन्द्र द्वारा इलाज के लिए दिन निर्धारित किया जाना चाहिए? क्या महंगे इंजेक्शन के चलते मरीज़ के इलाज में देरी की जानी चाहिए। जबकि सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों पर अधिकतर मरीज़ वह होते हैं जो कि प्राइवेट डॉक्टरों की फ़ीस या निजी अस्पतालों का ख़र्चा उठाने में असमर्थ होते हैं।

