लखनऊ की मेयर के साथ हो गया बहुत बड़ा ‘खेला’! जानें क्यों रातों-रात छिन गई सारी पावर, अब सिर्फ नाम की रह गईं मेयर!
कभी-कभी ‘पावर’ का गलत इस्तेमाल करना भारी पड़ जाता है। सत्ता पक्ष से जुड़ाव और पावर हाथ में आने पर अक्सर जनप्रतिनिधि आसमान में उड़ने लगते हैं। उन्हें नियम-कानूनों की भी परवाह नहीं होती। हालांकि समय का चक्र चलता रहा है। समय बदलने पर अच्छे-अच्छे ‘धुरंधर’ आसमान से जमीन पर आ जाते हैं। ताजा उदाहरण लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल हैं। जिन्हें हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक झटके में ‘पावर लैस’ कर दिया है। प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार सीज होने से उन्हें बड़ा झटका लगा है।
वैसे सुषमा खर्कवाल समय-समय पर चर्चाओं में रहती हैं। काफी समय पहले वह बांग्लादेशी घुसपैठियों पर बयान देकर चर्चा में रही थीं। उन्होंने दावा किया था कि लखनऊ में दो लाख बांग्लादेशी अवैध तरीके से निवासरत हैं। लगभग दो साल पहले उन्होंने शहर में नालों की सफाई न होने पर नगर निगम के अधिकारियों को नालों में फेंक देने की धमकी दे डाली थी। मूल रूप से उत्तराखंड की रहने वाली सुषमा खर्कवाल पिछले तीन दशक से भाजपा में हैं। हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच द्वारा उनके प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकार सीज किए जाने के पीछे बड़ी वजह सामने आई है।
कोर्ट के एक झटके ने आसमान से सीधे जमीन पर पटका
समाजवादी पार्टी (सपा) के पार्षद ललित किशोर तिवारी को पद की शपथ न दिलाए जाने को लेकर विवाद की शुरुआत हुई थी। यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंच गया। अदालत ने सपा पार्षद को सप्ताह भर में शपथ दिलाने का आदेश मेयर को दिया था। आदेश का अनुपालन न होने पर कोर्ट को सख्त रवैया अख्तियार करना पड़ा है। सुषमा खर्कवाल पहली ऐसी मेयर बन गई हैं, जिनके खिलाफ हाईकोर्ट को इस प्रकार का कदम उठाना पड़ा है। उनके प्रशासनिक एवं वित्तीय अधिकारों के निर्वहन की जिम्मेदारी डीएम और नगर आयुक्त को सौंपी गई है।
दरअसल लखनऊ में नगर निकाय चुनाव के दौरान भाजपा के प्रदीप शुक्ला ने पार्षद पद पर जीत दर्ज की थी। सपा के ललित किशोर तिवारी दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में सपा प्रत्याशी ललित ने कोर्ट में प्रदीप के खिलाफ याचिका दायर की। इसमें उन पर नामांकन के चुनावी हलफनामे में दूसरी शादी और कुछ अनिवार्य एवं व्यक्तिगत जानकारी छिपाने का आरोप लगाया गया था। मामला कोर्ट तक पहुंचा।
कोर्ट ने प्रदीप शुक्ला के निर्वाचन को रद्द कर ललित को पार्षद के तौर पर निर्वाचित कर दिया था, मगर पिछले पांच माह से ललित तिवारी को शपथ नहीं दिलाई जा सकी है। फिलहाल यह मामला लखनऊ में चर्चाओं का विषय बन चुका है। कोर्ट के आदेश के बाद सुषमा खर्कवाल सिर्फ नाम की मेयर रह गई हैं। यूपी में नगर निकायों की सियासत बेहद जटिल है। पार्षद बनने के लिए भी खूब कसरत की जाती है।
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चुनाव में धन और बाहुबल का इस्तेमाल होता है। जिनके पास पैसा है, वह सिर्फ ‘नेम’ और ‘फेम’ के लिए यह पद हासिल करना चाहते हैं। जिन्हें वाकई में जनसेवा करनी होती है, उन्हें बदले में मेवा पाने की इच्छा नहीं होती। अधिकांश नगर निगमों में कमीशनखोरी के चक्कर में पार्षदों को बदनामी झेलनी पड़ती है। प्रत्येक वार्ड में विकास कार्य होने पर संबंधित पार्षद को ठेकेदार से कमीशन का निर्धारित पैसा मिलता है, ऐसे आरोप आम हैं। लखनऊ में सपा पार्षद ललित तिवारी को शपथ न दिलाने के पीछे मेयर सुषमा खर्कवाल की क्या मंशा थी, यह तो वही जानें, मगर कोर्ट के ताजा आदेश से उनकी परेशानी जरूर बढ़ गई है।

