बिहार विधानसभा चुनाव 2025: गांव-गांव में नीतीश की पकड़, जानें भाजपा क्यों नहीं खोज पाई नया चेहरा
जैसे-जैसे भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के कार्यक्रम की घोषणा करने की तैयारी कर रहा है प्रदेश में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर असमंजस का माहौल कायम है। भाजपा जो राज्य में एक मजबूत शक्ति के रूप में उभरी है अब भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही एनडीए के चुनावी अभियान को आगे बढ़ाने का इच्छुक नजर आ रहा है। हालांकि भाजपा के शीर्ष नेताओं ने यह कहा था कि वे नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का चेहरा बनाए रखने के पक्ष में हैं इसके बावजूद भाजपा के पास एक बड़ा नेतृत्व का संकट बना हुआ है।
भाजपा की बढ़ती ताकत और नीतीश कुमार का महत्व
2020 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने 74 सीटें जीतकर 243 सदस्यीय विधानसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई थी। मार्च 2022 में तीन विकाशशील इंसान पार्टी (VIP) विधायकों के भाजपा में शामिल होने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 77 हो गया। वर्तमान में भाजपा के पास बिहार विधानसभा में 78 विधायक हैं जबकि नीतीश कुमार की पार्टी जनतादल-यूनाइटेड (JD-U) के पास 43 सीटें हैं। इसके बावजूद भाजपा का झुकाव नीतीश कुमार की ओर दिखता है क्योंकि वे राज्य में भाजपा के लिए आवश्यक समर्थन आधार प्रदान करते हैं।
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भाजपा के पास मुख्यमंत्री का कोई संभावित चेहरा नहीं है बल्कि नीतीश के पास एक ऐसा समर्थक वर्ग है जो उनके प्रति वफादार बना हुआ है। यही वजह है कि भाजपा भले ही चुनावी दृष्टि से मजबूत हो फिर भी नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही अपनी राजनीतिक यात्रा को जारी रखने की इच्छा रखती है।
बिहार में जातीय गणित पर एक नजर
बिहार का राजनीतिक समीकरण जातीय आधार पर आधारित है जिसमें अत्यंत पिछड़ी जातियाँ (EBCs) 36% हैं दलितों की संख्या 19.65% और अन्य पिछड़ी जातियों (OBCs) की संख्या 27.12% है। इनमें से यादवों की परंपरागत पहचान राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के साथ जुड़ी हुई है जबकि नीतीश कुमार के समर्थन में गैर-यादव OBCs और EBCs खड़े होते हैं।
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नीतीश कुमार की पार्टी JD-U ने 2020 के चुनाव में 15.39% वोट शेयर प्राप्त किया फिर भी उनके पास गैर-यादव OBCs EBCs दलितों और महिलाओं का मजबूत समर्थन आधार है। ये वफादार मतदाता नीतीश के साथ चुपचाप खड़े रहते हैं जो भाजपा के लिए बेहद अहम साबित होता है।
राजनीतिक विश्लेषक आदर्श पांडेय का कहना है कि नीतीश के पास एक “मजबूत नॉन-वोकल वोट बेस” है जो हमेशा उनके साथ रहता है। यही वजह है कि वोटिंग सर्वेक्षणों और एग्जिट पोल्स में उनके समर्थन का आंकड़ा अक्सर सही तरीके से परिलक्षित नहीं हो पाता है। पांडेय के अनुसार भाजपा के लिए नीतीश को मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में बनाए रखना चुनावी रणनीति का हिस्सा है।
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बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दबदबा
2005 से लेकर अब तक बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का दबदबा रहा है सिर्फ 2014 में एक छोटा सा अपवाद छोड़कर। उनके नेतृत्व में बिहार को स्थिरता का अनुभव हुआ जो राज्य में भाजपा के अन्य नेताओं से कहीं अधिक है। भले ही नीतीश कुमार पर उनके बार-बार गठबंधन बदलने के आरोप लगे हों फिर भी उनकी विश्वसनीयता और प्रशासनिक क्षमता के कारण उन्हें एक मजबूत नेता माना जाता है।
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आदर्श पांडेय का मानना है कि नीतीश कुमार की विश्वसनीयता और उनका दूर-दराज के इलाकों में भी पहचान बनाना उन्हें भाजपा के नेताओं से अलग करता है। उनके अनुसार “वह हर पंचायत हर ब्लॉक हर गांव में पहचाने जाते हैं जबकि भाजपा के नेता इतने व्यापक रूप से पहचान नहीं बना पाए हैं।”
बिहार में भाजपा का नेतृत्व संकट
भा.ज.पा. को बिहार में एक स्थिर और प्रभावशाली नेता की तलाश रही है और इस कारण से राज्य में नेतृत्व की एक बड़ी कमी महसूस हो रही है। भाजपा अब तक बिहार में अपना कोई ऐसा नेता नहीं ढूंढ पाई जो नीतीश कुमार की तरह लोगों से जुड़ सके। सबसे प्रमुख भाजपा नेता सुषील कुमार मोदी थे जिनका निधन मई 2024 में हुआ।
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पार्टी के भीतर नेतृत्व संकट के कारण भाजपा को नीतीश कुमार पर निर्भर रहना पड़ता है। पांडेय के अनुसार अगर भाजपा अपनी पार्टी से ऐसा कोई नेता उभारना चाहती है जो 15–16% वोट बेस को अकेले आकर्षित कर सके तो फिलहाल उसके पास ऐसा कोई नाम नहीं है।
भाजपा का नीतीश कुमार के प्रति दृष्टिकोण
एक टीवी चैनल से बातचीत के दौरान बिहार भाजपा विधायक देवेश कांत सिंह ने कहा कि यह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होंने नीतीश कुमार को एनडीए का चेहरा बनाया। उन्होंने यह भी बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात की पुष्टि की है कि बिहार में 2025 के विधानसभा चुनावों में नीतीश कुमार के नेतृत्व में ही एनडीए चुनाव लड़ेगा।
सिंह ने यह भी याद दिलाया कि 2020 में भाजपा के पास अधिक सीटें होने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री के रूप में चुना गया था और यह वादा एनडीए फिर से पूरा करेगा। उनकी बातों में यह साफ दिखाई दिया कि पार्टी नीतीश कुमार को चुनावी चेहरे के रूप में बनाए रखने के प्रति प्रतिबद्ध है।
बिहार चुनावों में एनडीए का प्रदर्शन
एनडीए ने बिहार विधानसभा चुनावों में पिछले कुछ सालों में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। 2005 में जब बिहार में विधानसभा चुनाव हुआ तब JD-U और भाजपा ने क्रमशः 88 और 55 सीटें जीतीं। इसके बाद 2010 में दोनों पार्टियों ने 115 और 91 सीटों के साथ शानदार प्रदर्शन किया।
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2015 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए से अलग होकर महागठबंधन में शामिल होने का निर्णय लिया तो RJD और JD-U के गठबंधन ने भाजपा को करारी शिकस्त दी। लेकिन 2020 में जब नीतीश ने एनडीए के साथ चुनाव लड़ा तो भाजपा ने अधिक सीटें जीतीं हालांकि JD-U का प्रदर्शन कमजोर रहा।
क्या है बिहार में भविष्य
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के दृष्टिकोण से एनडीए का नीतीश कुमार पर निर्भर रहना और उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ना बेहद महत्वपूर्ण रहेगा। भाजपा भले ही राज्य में मजबूत होती जा रही हो फिर भी उसका नेतृत्व संकट और जातीय समीकरणों के बीच नीतीश कुमार की अहमियत को नकारा नहीं जा सकता। फिलहाल नीतीश कुमार का स्थिर नेतृत्व और उनका व्यापक समर्थन आधार बिहार की राजनीति में एनडीए के लिए एक मजबूत हथियार बना हुआ है।

