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7 पुश्तों से रह रहे हैं, फिर भी नागरिक नहीं; रामगोपाल का सवाल जिसने हिला दिया सिस्टम

समाजवादी पार्टी (सपा) ने एक बार फिर एसआईआर (SIR) यानी सर्वे और आइडेंटिफिकेशन रजिस्ट्री को लेकर उत्तर प्रदेश की सरकार पर तीखा हमला बोला है। सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने मैनपुरी के भोगांव क्षेत्र में कार्यकर्ताओं से मुलाकात के दौरान इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उनका मानना है कि यह केवल वोट काटने का एक नया तरीका है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों पर सीधा हमला है।

एसआईआर पर खड़े किए गए गंभीर सवाल

रामगोपाल यादव ने तर्क दिया कि मतदान हमेशा सरल प्रक्रिया से होता रहा है और हर चुनाव में मृतक या विस्थापित लोगों के नाम स्वतः ही काट दिए जाते थे। उनके अनुसार, इस तरह की विस्तृत रजिस्ट्री की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। उन्होंने इस पहल को लोगों के मताधिकार को छीनने की साज़िश करार दिया।

यादव ने इस बात पर जोर दिया कि सरकार ने इसे नागरिकता की पहचान से जोड़ा है। उनका सवाल था: अगर कोई व्यक्ति गलती से फॉर्म नहीं भर पाता है, भले ही उसके पूर्वज पीढ़ियों से यहीं रह रहे हों, तो क्या उसे नागरिक नहीं माना जाएगा? उन्होंने आशंका व्यक्त की कि ऐसे लोगों को ‘घुसपैठिया’ मानकर उन्हें देश से बाहर भेजे जाने की धमकी दी जा सकती है, जिससे जीने का अधिकार भी खतरे में पड़ जाता है।

हाई-प्रोफाइल नेताओं के नाम ‘श्रेणी सी’ में

एसआईआर की प्रक्रिया में विसंगतियों का उल्लेख करते हुए रामगोपाल यादव ने बताया कि उनके जैसे वरिष्ठ नेता, जो 1967 से मतदान कर रहे हैं और लगातार जनप्रतिनिधि रहे हैं, उन्हें भी ‘श्रेणी सी’ (Category C) में डाल दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब किसी का नाम 2003 और 2025 की वोटर लिस्ट में साफ है, तो उन्हें किसी दस्तावेज़ की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए और उन्हें ‘श्रेणी ए’ में रखा जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि सिर्फ उनका ही नहीं बल्कि अखिलेश यादव, शिवपाल यादव और इटावा के लगभग सभी सांसद और विधायक यानी सात लोकसभा सांसद, एक राज्यसभा सांसद और तीन विधायक, सभी ‘श्रेणी सी’ में शामिल हैं। सपा के विरोध के बाद चुनाव आयोग ने ‘डिलीट’ का विकल्प देने की बात कही है, जिससे बीएलओ श्रेणी को बदल सकेंगे।

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बीएलओ पर भारी दबाव: आत्महत्याओं का मुद्दा

यादव ने बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) पर पड़ रहे अत्यधिक दबाव का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने बताया कि एसआईआर को समय पर पूरा करने के दबाव के कारण कई बीएलओ ने आत्महत्या जैसा कदम उठाया है। इसी मानवीय संकट को देखते हुए सपा ने चुनाव आयोग से एसआईआर की समय सीमा तीन महीने बढ़ाने की मांग की थी। हालांकि, आयोग ने केवल सात दिन का ही विस्तार दिया।

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उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की कि वे बीएलओ के साथ मिलकर काम करें ताकि कोई भी योग्य मतदाता सूची से बाहर न हो।

संसद में मुख्य मुद्दा बना एसआईआर

सपा नेता ने केंद्र सरकार पर संसद को सही तरीके से न चलाने देने का भी आरोप लगाया। उनका स्पष्ट कहना था कि सदन में इस समय एसआईआर से अधिक महत्वपूर्ण कोई दूसरा मुद्दा नहीं है। उन्होंने सर्वदलीय बैठक में भी यह बात उठाई थी कि सरकार जो विधेयक ला रही है, उनका आम जनता से कोई लेना-देना नहीं है, वे केवल व्यापारियों के हितों से जुड़े हैं।

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यादव ने आरोप लगाया कि सरकार जानबूझकर एसआईआर पर बहस से बच रही है। भले ही चर्चा की बात कही गई हो, लेकिन उसके लिए कोई निश्चित समय नहीं दिया जा रहा है।

‘पीडीए प्रहरी’ मैदान में: वोट बचाने की कवायद

उत्तर प्रदेश में सपा पार्टी के कार्यकर्ता जी-जान से मेहनत कर रहे हैं ताकि किसी का वोट न कटे। अखिलेश यादव ने तो इसके लिए ‘पीडीए प्रहरी’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) भी नियुक्त किए हैं, जो बूथ स्तर पर काम कर रहे हैं। सपा का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में वोट कटते हैं तो इसका सीधा नुकसान समाजवादी पार्टी को उठाना पड़ सकता है। वहीं, बंगाल में भी एसआईआर के मुद्दे पर ममता बनर्जी लगातार रैलियां और पदयात्राएं कर रही हैं, जिससे यह मामला एक राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है।

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