सपा के PDA की काट कैसे बने पंकज चौधरी, जानिए सब कुछ
उत्तर प्रदेश की सियासत में भारतीय जनता पार्टी ने एक बड़ा उलटफेर करते हुए संगठन की बागडोर पंकज चौधरी को सौंप दी है। केंद्रीय वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने निर्विरोध निर्वाचित होकर प्रदेश अध्यक्ष का पद संभाल लिया है। राजनीतिक गलियारों में अब इस बात की चर्चा तेज है कि आखिर 2027 के विधानसभा संग्राम से पहले पार्टी ने इस अनुभवी चेहरे पर भरोसा क्यों जताया।
दरअसल दिल्ली दरबार ने काफी सोच-विचार के बाद पूर्वांचल के इस दिग्गज नेता का चयन किया है। सात बार संसद पहुँचने वाले पंकज चौधरी को कमान सौंपने के पीछे भाजपा की एक गहरी चुनावी रणनीति छिपी है। पार्टी का मुख्य लक्ष्य आगामी चुनावों में पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद करना है। समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फार्मूले का मुकाबला करने के लिए भाजपा ने यह कुर्मी कार्ड खेला है।
सत्तारूढ़ दल ने एक बार फिर अपने अप्रत्याशित निर्णयों से सबको अचंभित कर दिया। महीनों से चल रही कयासबाजियों और संभावित नामों की सूची को दरकिनार करते हुए आलाकमान ने पंकज चौधरी के नाम पर मुहर लगाई। इस फैसले के जरिए भाजपा ने सपा प्रमुख अखिलेश यादव की चुनौतियों में इजाफा कर दिया है। रणनीतिकारों का मानना है कि इस कदम से खिसकते हुए कुर्मी वोट बैंक को वापस भाजपा के पाले में लाया जा सकेगा जिसका सीधा प्रभाव विपक्षी खेमे की ताकत पर पड़ेगा।
पंकज चौधरी का राजनीतिक सफर जमीनी स्तर से शुरू हुआ था। एक पार्षद से लेकर केंद्रीय मंत्री बनने तक का उनका सफर कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। चार दशकों का लंबा अनुभव और चुनावी प्रबंधन की गहरी समझ उनकी सबसे बड़ी ताकत है। संगठन को उम्मीद है कि उनकी नेतृत्व क्षमता 2027 के महाकुंभ और पंचायत चुनावों में कार्यकर्ताओं के भीतर नया जोश भर देगी।
राज्य में कुर्मी समाज की भागीदारी कितनी
जातीय समीकरणों की बात करें तो उत्तर प्रदेश की जनसंख्या में कुर्मी समाज की भागीदारी लगभग 7 से 8 प्रतिशत है। यादव मतदाताओं के बाद इस वर्ग को पिछड़ा वर्ग में सबसे प्रभावशाली माना जाता है। प्रदेश के करीब 25 जिलों में इस समाज का दबदबा है जबकि 16 जनपदों में इनकी राजनीतिक हैसियत निर्णायक है। लगभग 50 विधानसभा सीटों और 10 लोकसभा क्षेत्रों के परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखने वाले इस समाज को साधने के लिए पंकज चौधरी सबसे उपयुक्त चेहरा माने जा रहे हैं।
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राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार पंकज चौधरी की संघ और संगठन दोनों में गहरी पैठ है। वे सहयोगियों और पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं। बीजेपी को विश्वास है कि वे अपना दल जैसे सहयोगी दलों के वोटर्स को भी मुख्य धारा से जोड़ने में सफल होंगे। अब यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या पंकज चौधरी सपा के जातीय तिलस्म को तोड़कर कमल खिलाने में कामयाब होते हैं। फिलहाल इस नियुक्ति ने यूपी की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है।

