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किसी ने नहीं लिया कानून हाथ में, जानें सवर्ण समाज ने कैसे शांतिपूर्ण तरीके से किया यूजीसी के नए नियमों का विरोध

न आगजनी, न पथराव, न तोड़फोड़, न किसी सरकारी व निजी संपत्ति को नुकसान…। आंदोलन ऐसे भी होते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (यूजीसी) के नए नियमों पर रोक लगाए जाने के बाद सोशल मीडिया पर कमेंट्स की मानो बाढ़ आ गई। देश की शीर्ष अदालत के फैसले से प्रसन्न यूजर्स की बांछें खिल गईं। उन्होंने सोशल मीडिया पर कमेंट्स के जरिए अपनी प्रसन्नता का इजहार किया।

विरोध में ढेरों कमेंट्स देखने को मिले

यूजीसी के नए नियमों के विरोध में ढेरों कमेंट्स देखने को मिले। एक यूजर्स ने लिखा, गजब संविधान है…। कलेक्टर अपने बेटे की फीस नहीं भरेगा क्योंकि वो एससी है, और चपरासी तिनगुना भरेगा क्योंकि वो सवर्ण है..! एक यूजर्स ने कमेंट किया, पद पर बैठा भाजपा का कोई नेता नहीं बोला जिनकी हम जय-जयकार करते हैं, मगर सुप्रीम कोर्ट बोला, बहुत-बहुत धन्यवाद। एक यूजर ने यह लिखकर नाराजगी जताई कि टिकट दोगे जाति देखकर, मंत्रालय दोगे जाति देखकर, नौकरी दोगे जाति देखकर, मुकदमा लिखोगे जाति देखकर और यदि सवर्ण अपने हक या बचाव के लिए आवाज उठाए तो जातिवादी है!

सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद यह विवाद फिलहाल शांत होने की उम्मीद है। अदालत ने केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी कर जवाब भी मांगा है। इस बीच कुछ राजनीतिज्ञों की प्रतिक्रिया सामने आई है। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री एवं बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का यूजीसी के नए नियम पर रोक लगाने का फैसला उचित है।

जानें क्या बोले अखिलेश यादव

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि बात सिर्फ नियम नहीं, नियत की भी होती है। न किसी का उत्पीड़न हो, न किसी के साथ अन्याय। न किसी पर ज़ुल्म और ज्यादती हो, न किसी के साथ नाइंसाफ़ी। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बयान दिया कि यूजीसी नियम पर सर्वोच्च न्यायालय की रोक से देश के विद्यार्थियों, शिक्षकों और शैक्षणिक संस्थानों को बड़ी राहत मिली है। कुल मिलाकर देशभर में उभरा यह विवाद ठंडा पड़ने लगा है। इस दौरान केंद्र सरकार और यूजीसी के खिलाफ आंदोलनकारियों खासकर सवर्ण समाज ने जिस प्रकार का कदम उठाया, वह प्रशंसनीय है।

देश के किसी भी हिस्से में सरकार या यूजीसी के विरोध में प्रदर्शनकारियों ने कानून को हाथ में नहीं लिया। विरोध का तरीका बेहद शांतिपूर्ण देखने को मिला। आमतौर पर इस प्रकार के संवेदनशील मामले पर समाज में हिंसा और अशांति फैलने का खतरा बढ़ जाता है, मगर प्रदर्शनकारियों ने नाराजगी जताने के लिए समझदारी भरा तरीका अपनाया। विरोध-प्रदर्शन के अलावा सोशल मीडिया को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया। इसके मद्देनजर सरकार की बेचैनी भी बढ़ी हुई थी।

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देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में यदा-कदा भेदभाव के मामले प्रकाश में आ जाते हैं, मगर उन्हें रोकने के लिए यूजीसी ने जो नए नियम बनाए, उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे शिक्षा संस्थानों में बड़े पैमाने पर भेदभाव हो रहा था और एससी-एसटी-ओबीसी वर्गों के लाखों छात्र पीड़ित हो रहे थे। शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव की कुछ शिकायतें सामने आती थीं और उनमें भी चुनिंदा सही पाई जाती थीं। आखिर ऐसे में ऐसे नियम क्यों बनाए गए, जो यह प्रतीत करा रहे थे कि शिक्षा संस्थान जातिगत भेदभाव के गढ़ बन गए हैं?

यूजीसी के नियमों में आगे किस तरह के संशोधन-परिवर्तन होंगे, इसके लिए थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। हालांकि नियम ऐसे होने चाहिए, जिससे जातिगत तनाव की स्थिति पैदा न हो।

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