जयपुर में ‘पुर’ और हैदराबाद में ‘बाद’ क्यों, शहरों के नाम के पीछे छिपा है 3500 साल पुराना राज!
क्या आपने कभी गौर किया है कि हमारे देश के नक्शे पर नजर डालते ही शहरों के नाम में एक खास पैटर्न नजर आता है? कहीं कानपुर, जयपुर और रायपुर की भरमार है, तो कहीं इलाहाबाद, हैदराबाद और अहमदाबाद का दबदबा।
जब इन नामों की गहराई में जाने की कोशिश की, तो इतिहास की कुछ ऐसी परतें खुलीं जो वाकई दिलचस्प हैं। आज की इस स्पेशल रिपोर्ट में हम समझेंगे कि हमारे शहरों के नाम के पीछे छिपे इन ‘सरनेम्स’ यानी प्रत्यय (Suffix) का असली किस्सा क्या है।
‘पुर’ का प्राचीन सफर: ऋग्वेद से हस्तिनापुर तक
सबसे पहले बात करते हैं ‘पुर’ की। जयपुर, जोधपुर या जबलपुर जैसे नामों में जो ‘पुर’ शब्द जुड़ा है, वह दरअसल शुद्ध संस्कृत से आया है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों और ऋग्वेद में ‘पुर’ का अर्थ ‘किला’, ‘नगर’ या ‘घेरे वाली जगह’ बताया गया है।
हैरानी की बात यह है कि यह परंपरा करीब 3500 साल पुरानी है। महाभारत काल में भी हम ‘हस्तिनापुर’ का जिक्र सुनते हैं। मध्यकाल में जब राजाओं ने नए शहर बसाए, तो उन्होंने अपने नाम के पीछे ‘पुर’ जोड़ना शुरू कर दिया।
मिसाल के तौर पर: महाराजा जयसिंह ने जयपुर बसाया
कानपुर के बारे में कहा जाता है कि राजा हिंदू सिंह ने इसे कान्हापुर (भगवान कृष्ण के नाम पर) के रूप में बसाया था, जो वक्त के साथ कानपुर बन गया।
‘आबाद’ की कहानी: पानी और खुशहाली का संगम
अब रुख करते हैं उन शहरों की तरफ जिनके अंत में ‘आबाद’ जुड़ता है, जैसे फिरोजाबाद या मुरादाबाद। यह शब्द फारसी (Persian) भाषा से लिया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि फारसी में ‘आब’ का मतलब होता है पानी। पुराने समय में किसी भी सभ्यता के बसने के लिए पानी पहली जरूरत थी। इसलिए ‘आबाद’ शब्द का इस्तेमाल ऐसी जगह के लिए होने लगा जो उपजाऊ हो और जहां जीवन पनप सके।
ज्यादातर आबाद नाम वाले शहर किसी न किसी नदी के किनारे बसे हैं। जैसे रामगंगा के किनारे बसा मुरादाबाद।
मुगल काल में बादशाहों ने अपनी छाप छोड़ने के लिए भी शहरों के नाम अपने नाम पर रखे और पीछे ‘आबाद’ लगा दिया, जैसे फिरोज शाह के नाम पर फिरोजाबाद।
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आखिर ये ‘गंज’ क्या बला है?
आपने हजरतगंज दरियागंज या पहाड़गंज जैसे नाम तो सुने ही होंगे। क्या आप जानते हैं कि ‘गंज’ का असल मतलब क्या होता है?
इतिहासकारों की मानें तो गंज शब्द का संबंध खजाने और अनाज के भंडार से रहा है। प्राचीन काल में इसे ‘मंडी’ या ‘बाजार’ के लिए इस्तेमाल किया जाता था। जहां व्यापार होता था, शोर-शराबा रहता था और भारी भीड़ जुटती थी, उन इलाकों को ‘गंज’ कहा जाने लगा।
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दिल्ली का दरियागंज कभी यमुना नदी (दरिया) के किनारे लगने वाला एक बड़ा बाजार था, इसलिए इसका नाम दरियागंज पड़ा।
तो अगली बार जब आप किसी नए शहर की यात्रा करें, तो उसके नाम पर गौर जरूर कीजिएगा। वह नाम सिर्फ एक पता नहीं, बल्कि सदियों पुराने इतिहास का एक छोटा सा हिस्सा है।

