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प्रशांत किशोर की असफलता के असली कारण

डॉ. प्रवेश कुमार एवं अमित कुमार यादव

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजे आ चुके हैं और अब तक नई सरकार का गठन भी हो चुका है। इसके साथ ही नीतीश कुमार राज्य के सबसे लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए हैं। इस पूरे चुनावी दौर में अनेक राजनीतिक घटनाओं ने हलचल पैदा की, लेकिन जिस पहल ने सबसे स्थायी और व्यापक ध्यान खींचा, वह थी प्रशांत किशोर की नई पार्टी ‘जन सुराज’।

इस बार बिहार ही नहीं बल्कि देश भर में यह उत्सुकता थी कि क्या शिक्षा, रोज़गार और पलायन जैसे बुनियादी सामाजिक-आर्थिक मुद्दों को केंद्र में रखकर कोई राजनीतिक पहल राज्य की जड़ जमा चुकी सत्ता-संरचना को चुनौती दे सकता है? यह उत्सुकता सतही नहीं थी क्योंकि किशोर के अभियान ने न केवल बिहार की विकास संबंधी कमियों को उजागर किया, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की व्यापक संरचनात्मक कमजोरियों को भी रेखांकित किया। ऐसे में यह मूल प्रश्न उठता है कि इतने प्रासंगिक मुद्दों पर आधारित राजनीतिक परियोजना जनता का समर्थन चुनावी सफलता में क्यों नहीं बदल सकी?

प्रशांत किशोर, जिन्हें आमतौर पर पीके के नाम से जाना जाता है, जो बिहार के बक्सर जिले से हैं और पिछले एक दशक में भारतीय चुनावी राजनीति की रणनीतियों और प्रबंधन को गहराई से प्रभावित कर चुके हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय विकास के क्षेत्र से अपनी पेशेवर यात्रा शुरू करने के बाद, 2011 में उन्होंने राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में एक नया मुकाम स्थापित किया। डेटा एनालिटिक्स, सूक्ष्म स्तर के कैंपेन प्रबंधन और बूथ-स्तरीय खुफिया तंत्र को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाकर उन्होंने इस क्षेत्र में नई पहचान बनाई।

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नरेंद्र मोदी, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, जगन मोहन रेड्डी और अमरिंदर सिंह जैसे नेताओं के साथ उनकी रणनीतिक भूमिका ने उन्हें चुनावी अभियानों का सबसे प्रभावशाली चेहरा बना दिया। इन सफलताओं के साथ पीके का यह विश्वास हुआ कि भारतीय राजनीति में केवल चुनाव जीताने तक सीमित न रहकर वें राजनीतिक-प्रशासनिक संस्कृति में व्यापक बदलाव का भी प्रयास करें। इसी सोच से प्रेरित होकर उन्होंने 2022 में लंबी जनसुराज-यात्रा की और परिणामतः 2 अक्टूबर 2024 को जन सुराज पार्टी की औपचारिक स्थापना हुई।

जन सुराज के सामने सबसे बड़ी बाधा बिहार की जटिल और ऐतिहासिक रूप से जमी हुई राजनीतिक संरचना थी। मुद्दा-आधारित राजनीति का महत्व तो है, पर उसकी प्रभावशीलता सीमित हो जाती है जब सत्ता-समीकरण जाति, सामाजिक पदानुक्रम, स्थानीय संगठनात्मक ढांचों और ऐतिहासिक चुनावी स्मृति से गहराई से जुड़े हों। पीके की विफलता को समझने के लिए हमें संरचनात्मक, सामाजिक-सांस्कृतिक और संगठनात्मक कारणों को समग्र रूप से देखना होगा।

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पहला, बिहार का राजनीति लंबे समय से द्विध्रुवीयता की ओर झुका हुआ है। ड्यूवेर्जर के सिद्धांत के अनुसार, बहुदलीय लोकतंत्रों में भी चुनावी प्रतियोगिता अक्सर दो मुख्य ध्रुवों के इर्द-गिर्द सिमट जाती है। 2014 के बाद यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर दोनों पर और गहरी हुई। बिहार की राजनीति महागठबंधन (सामाजिक न्याय आधारित राजनीति) और एनडीए (सुशासन आधारित राजनीति) के बीच प्रतिस्पर्धा के तौर पर विकसित हुई है।

जन सुराज का तीसरा विकल्प बनना संरचनात्मक रूप से कठिन था क्योंकि न उसके पास संगठित सामाजिक आधार था, न ही ज़मीन पर ऐसी पकड़ जो इस द्विध्रुवीय व्यवस्था को चुनौती दे सके इसलिए यह संघर्ष चुनावी कम और संरचनात्मक अधिक था। दूसरा, पार्टी का कार्यक्रम कई बार राज्य की सामाजिक- सांस्कृतिक वास्तविकताओं से टकराता दिखा। शराबबंदी हटाने की मांग भले ही तर्कसंगत हो लेकिन महिलाओं के बड़े वर्ग को असहज लगी, जिन्होंने इस नीति से प्रत्यक्ष लाभ महसूस किए थे। बिहार में महिला मतदाता लगातार निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं, ऐसे में यह रुख जन सुराज की संभावनाओं के लिए बाधक बना।

इसी तरह पुलिस सुधार से जुड़े प्रस्ताव भी कुछ वर्गों में असुरक्षा की भावना पैदा करते दिखे। यह दर्शाता है कि पीके जाने अनजाने इन मुद्दों को उठाकर सामाजिक सुधार और सामाजिक न्याय विरोधी दिखे जिससे तमाम वर्गों जिसमे प्रमुख रूप से महिलाओं के बीच फ़ियर क्रिएट हो गया। तीसरा, पार्टी के नेतृत्व की सामाजिक संरचना भी एक बड़ी बाधा बनी।

मंडल राजनीति के बाद बिहार में नेतृत्व का सामाजिक रूप से विविध होना राजनीतिक वैधता की अनिवार्य शर्त बन गई ऐसे में जन सुराज का नेतृत्व ऊँची जातियों के हाथ में दिखाई दिया, जिससे पिछड़े, अति-पिछड़े और दलित समुदायों के बीच विश्वास विकसित नहीं हो सका। बीजेपी और जेडीयू ने जहां इस सामाजिक संतुलन को रणनीतिक रूप से संभाला, वहीं आरजेडी की वैधता सामाजिक न्याय की राजनीति से आती है। जन सुराज इस मोर्चे पर कमजोर साबित हुई। चौथा, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक निर्माण की कमजोरी भी महत्वपूर्ण थी।

पीके ने ‘नई राजनीति’ के नाम पर राजनीतिक अनुभवहीन और गैर-परंपरागत उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी। यह आदर्शवादी दृष्टि तो थी, पर बिहार जैसी चुनावी जमीन पर व्यावहारिक रूप से कमजोर साबित हुई, जहाँ जाति-संबंध, स्थानीय नेटवर्क और संसाधन-आधारित राजनीति निर्णायक रहती है। कई उम्मीदवार जमीनी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ गए। इसके साथ ही चुनाव से ठीक पहले टिकट वितरण को लेकर असंतोष और लेन-देन के आरोपों ने पार्टी की विश्वसनीयता को और कमजोर किया। पाँचवाँ, सामाजिक न्याय के स्थापित विमर्श से टकराव भी एक अहम कारण रहा।

लालू-नीतीश युग ने पिछड़े, अतिपिछड़े और दलित समुदायों की राजनीतिक भागीदारी को गहराई से संस्थागत किया है। पीके द्वारा 1990 के दशक से ही बिहार के पतन का दौर बताने वाला नैरेटिव कई पिछड़े तबकों को इस आशंका से भर दिया कि और जन सुराज को सामाजिक न्याय विरोधी बना दिया क्योंकि इस पूरे कालखंड में सभी मुख्यमंत्री दलित पिछड़े समाज से आते हैं, परिणामतः इस वर्ग ने पार्टी से दूरी बनाए रखी।

छठा और अंतिम कारण पीके की सार्वजनिक छवि और व्यवहार रहा। कई पर्यवेक्षकों ने महसूस किया कि मतदाताओं, कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं और मीडिया के साथ उनके व्यवहार में एक प्रकार का अलगाव और अहंकार दिखा, लोकतांत्रिक राजनीति में व्यक्तिगत विनम्रता और जुड़ाव का बड़ा महत्व होता है। जहाँ नरेंद्र मोदी और जैसे नेता लंबे समय से सुलभ और विनम्र छवि गढ़ने में सफल रहे हैं, जो व्यापक जनसमर्थन पैदा करती है। इसके विपरीत, सम्राट चौधरी या नीतीश कुमार पर पीके के व्यक्तिगत आक्षेप कई लोगों को अनावश्यक रूप से कठोर लगे। यह धारणा उनकी राजनीतिक यात्रा के लिए भारी पड़ी।

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और अंततः यह माना जा सकता है कि प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी जन सुराज की विफलता किसी एक गलती का परिणाम नहीं थी, बल्कि बिहार की बहुस्तरीय सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं, गहरी जमी चुनावी द्विध्रुवीय और संगठनात्मक कमियों के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हुई।

पार्टी ने एक नया राजनीतिक शब्दकोश गढ़ने का प्रयास किया, विकास संबंधी मूल मुद्दों को केंद्र में रखा और चुनावी अभियान में कई नवाचार किए, लेकिन इन गुणों को ठोस चुनावी सफलता में बदलने के लिए दीर्घकालीन सामाजिक पैठ, विस्तृत संगठन निर्माण और जाति-संवेदनशील नेतृत्व संरचना की आवश्यकता थी। यह असफलता पीके की राजनीतिक दृष्टि की पराजय नहीं, बल्कि भारतीय राज्यों की राजनीति की कठोर वास्तविकताओं का संकेत है जहाँ सबसे कठिन चुनौती मुद्दे गिनाने में नहीं, बल्कि सामाजिक-संस्थागत संरचनाओं को बदलने में निहित है। भारतीय राजनीति में मुकाबला उतना ही संरचनाओं को पुनर्गठित करने का है, जितना कि नए नैरेटिव और नीतिगत हस्तक्षेप पेश करने का।

(कुमार जेएनयू में सह-आचार्य एवं यादव शोधार्थी हैं)

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