रेवड़ी कल्चर: सरकार की ‘मुफ्त’ की सुविधा देश को बना रही है दिवालिया
रेवड़ी कल्चर: देश में जरूरत रोजगार के अवसर बढ़ाने की है। इसके बजाए मुफ्त की सुविधाओं पर राजनीतिक दलों का जोर वाकई चिंताजनक है। जनता को मुफ्त की रेवड़ियां बांटने का यह चलन अर्थव्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डाल रहा है।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनता पर राजनीतिक दलों की पकड़ ढीली हो रही है? क्या दिग्गज नेताओं की विश्वसनीयता का पैमाना घट रहा है? क्या मुफ्त की सुविधाएं आमजन की आदत को खराब नहीं कर रही हैं? भाजपा, कांग्रेस, सपा और आम आदमी पार्टी (आप) जैसे तमाम दल चुनावी मौसम में मतदाताओं को रिझाने के लिए रेवड़ियों के वितरण पर फोकस करने लगते हैं। यह प्रचलन कतई उचित नहीं है।
असल में जरूरतमंदों को रोजगार की जरूरत है, मगर उन्हें फ्री सुविधाएं देकर भरमाया जा रहा है। जब सक्षम नागरिकों को भी मुफ्त की योजनाओं का लाभ मिलता है तो व्यक्ति एक प्रकार से काम न करने के आदी बनने के अलावा शासन पर बोझ बनते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुफ्त की रेवड़ियां कहलाने वाली लोकलुभावन योजनाओं पर अपनी आपत्ति और चिंता जाहिर करना ध्यान देने योग्य तथ्य है। इसके पहले भी शीर्ष अदालत इस विषय पर चिंता प्रकट कर चुकी है।
मुफ्त की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधक: कोर्ट
अदालत कई बार यह कह चुकी है कि मुफ्त की संस्कृति आर्थिक विकास में बाधक है। विभिन्न सरकारें यदि इसी प्रकार मुफ्त अनाज, बिजली, साइकिल आदि बांटती रहीं तो विकास के लिए धन कहां से आएगा? ऐसा प्रतीत होता है कि विभिन्न राजनीतिक दल यह मान चुके हैं कि लोकलुभावन योजनाएं चुनाव जीतने की गारंटी बन गई हैं। इसका नतीजा यह है कि चुनाव आने पर सत्तारूढ़ दल और विपक्षी दल मुफ्त की योजनाओं का पिटारा खोलने में जुट जाते हैं।
अधिकांश राज्य सरकारें आमतौर पर बुनियादी ढांचे के विकास के लिए धन की कमी का रोना रोती हैं और फिर भी मुफ्त की संस्कृति को बढ़ावा देने से पीछे नहीं हटती। स्पष्ट है कि वह अपनी आर्थिक स्थिति की अनदेखी करती हैं। देश के पांच राज्यों में भविष्य में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में संबंधित राज्य सरकारों द्वारा मुफ्त की योजनाओं की घोषणा की जाने लगी है।
तमिलनाडु सरकार ने कर दिया हैरान
तमिलनाडु सरकार ने हर किसी को मुफ्त बिजली देने की पेशकश कर दी है। मुफ्त में सुविधाएं उपहार देने से अंततः सरकारी खजाने पर असर पड़ता है और भारत के अधिकांश राज्यों की मजबूत वित्तीय स्थिति नहीं है एवं राजस्व के मामले में बहुत सीमित संसाधन हैं। यदि गरीबों की मदद करनी हो तो बिजली-पानी के बिल माफी जैसी कल्याणकारी योजनाओं को जायज ठहराया जा सकता है। यदि राजनीतिक दल प्रभावी आर्थिक नीतियां बनाएं, जिसमें भ्रष्टाचार या लीकेज की संभावना ना हो एवं लाभार्थियों तक सही तरीके से इनकी पहुंच सुनिश्चित की जाए तो इस प्रकार की मुफ्त घोषणाओं की आवश्यकता नहीं रहेगी।
पार्टियां जिन आर्थिक नीतियों या विकास मॉडलों को अपनाने की योजना बना रही हैं उन्हें जनता के सामने स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए और प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। भारत एक बड़ा देश है और अभी भी ऐसे नागरिकों का एक बड़ा समूह है जो गरीबी रेखा से नीचे हैं। देश की विकास योजना में सभी नागरिकों को शामिल करना भी जरूरी है।
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विवेकपूर्ण और समझदार तरीके से मुफ्त या सब्सिडी की पेशकश जिसे राज्यों के बजट में आसानी से समायोजित किया जा सकता है, अधिक नुकसान नहीं करती है एवं इसका लाभ उठाया जा सकता है।

