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हर घर में तुलसी, फिर भी गणेश जी क्यों नहीं करते स्वीकार; जानिए कारण और कथा

तुलसी के बिना कोई हिंदू घर नहीं होता और गणेश जी की मूर्ति के बिना कोई हिंदू घर नहीं होता। इसके बावजूद गणेश बप्पा को तुलसी के फूल क्यों पसंद हैं? उन्हें दूर्वा क्यों प्रिय है, तुलसी क्यों नहीं? तुलसी भी दूर्वा जितनी ही औषधीय है, फिर भी इसे बप्पा की सूची से बाहर क्यों रखा गया है? लेकिन भाद्रपद चतुर्थी यानी गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi 2025) पर बप्पा को तुलसी क्यों चढ़ाई जाती है? इस बारे में पुराणों में एक कथा वर्णित है।

पौराणिक कथा

एक अप्सरा बहुत सुंदर थी। वह एक अच्छा पति चाहती थी। इसके लिए वह व्रत, जप, व्रत, तीर्थयात्रा आदि करती थी। एक बार उसने तेजस्वी गणेश को ध्यान में लीन देखा। वह उन्हें बहुत पसंद करने लगी; इसलिए उसने उन्हें ध्यान से जगाने के लिए पुकारा, नृत्य किया और गीत गाए। अंततः गणेश की समाधि टूटी। गणपति ने अपनी आँखें खोलीं। तब उन्होंने अप्सरा को देखा। उन्होंने उससे कहा, “हे माता, तुम मेरे ध्यान में विघ्न क्यों डाल रही हो?”

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उसने कहा, “मैं तुम्हें बहुत पसंद करती हूँ। मैं तुमसे विवाह करना चाहती हूँ।”

गणेश ने कहा, “मैंने तुम्हें माँ कहकर भी कहा, फिर भी तुमने मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा? लेकिन मैं कभी विवाह नहीं करूँगा और न ही किसी प्रलोभन में फँसूँगा।”

इस पर अप्सरा ने कहा, “तुमने मुझे माँ कहकर मेरी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है। तुम्हारी इच्छा कभी पूरी नहीं होगी। मैं तुम्हें श्राप देती हूँ कि तुम्हारा विवाह शीघ्र ही हो जाएगा।”

गणेश ने उसे श्राप दिया, “स्वभाव से इतनी चंचल होने के कारण तुम दूसरों के लिए ख़तरा हो, इसलिए मेरे श्राप के कारण तुम पृथ्वी पर एक पौधा बन जाओगी।” अपनी स्वतंत्रता खोने के विचार से अप्सरा को बहुत पछतावा हुआ। उसने कहा, “मुझे क्षमा करें। मैं विवाह का अनुरोध लेकर आई हूँ, मेरे साथ अन्याय न होने दें।”

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गणेश ने कहा, “माँ, मैं श्राप वापस नहीं ले सकता, लेकिन तुम्हारी इच्छा पूरी करने के लिए स्वयं श्रीकृष्ण तुमसे विवाह करेंगे और तुम सुखी रहोगी।”

वह अप्सरा आगे चलकर तुलसी बनी। वह घर-घर में आदर-सत्कार से रहने लगीं और हर साल गोपाल कृष्ण से उनका विवाह कराने की प्रथा बन गई। फिर भी णेश जी ने तुलसी को स्वीकार नहीं किया बल्कि श्राप देकर उन्हें श्राप से मुक्त कर दिया। यही कारण है कि गणेश बप्पा को दूर्वा तो अर्पित की जाती है, लेकिन तुलसी नहीं। तुलसी दल केवल भाद्रपद चतुर्थी यानी गणेश चतुर्थी पर ही बप्पा को अर्पित किया जाता है। चूँकि यह पत्ते के रूप में भी होता है, इसलिए बप्पा इसे स्वीकार करते हैं। किसी और समय नहीं!

इस पौराणिक कथा पर सरल तर्क लागू करें, तो आपको पता चलेगा कि जंगली जानवर यानी हाथी का मुँह तुलसी से ज़्यादा औषधीय है, वही तुलसी मनुष्यों के लिए दूर्वा से ज़्यादा औषधीय है, इसलिए तुलसी कृष्ण, देवी, विष्णु और अन्य देवताओं को मानव रूप में अर्पित की जाती है, वही दूर्वा बप्पा को चढ़ाई जाती है।

इस वर्ष गणेश चतुर्थी 27 अगस्त (Ganesh Chaturthi 2025) को है। तो बस भाद्रपद चतुर्थी पर गणपति को तुलसी अर्पित करें और प्रेम व भक्ति से कहें, गणपति बप्पा मोरया!

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