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क्या सच में शक्तिशाली है भारत की अर्थव्यवस्था, इन आंकड़ों ने बढ़ाई सरकार की सरदर्दी

Union Budget 2026-27: भारत की अर्थव्यवस्था वर्तमान में एक ‘सोने के दौर’ का सामना कर रही है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में 7.3 फीसद की शानदार वृद्धि होने की संभावना है और जीडीपी चार ट्रिलियन डॉलर को पार कर चुकी है। एशिया में जापान को पछाड़ते हुए हम अब दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर हैं। महंगाई की दर घटकर दो फीसद के आस पास आ चुकी है और आने वाले वक्त में भी यह आरबीआई के निर्धारित लक्ष्य से नीचे ही रहने का अनुमान है।

आर्थिक संतुलन: खेती से लेकर खुदरा तक

कृषि क्षेत्र में मजबूती का अनुभव हो रहा है, अनाज के भंडार भरपूर हैं और ग्रामीण इलाकों में आय में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है। सरकार द्वारा किए गए टैक्स कटौती और जीएसटी में सुधारों ने उपभोक्ताओं को खर्च करने के लिए प्रेरित किया है। इसे अर्थशास्त्रियों द्वारा ‘गोल्डीलॉक्स’ दौर के रूप में देखा जा रहा है – न ज्यादा तेज न ज्यादा धीमा, सब कुछ एक आदर्श संतुलन में। हालांकि, ये उत्साहजनक आंकड़े कुछ अहम सवालों को भी छिपाए हुए हैं।

रोजगार संकट: आंकड़े कुछ और ही कहते हैं

सरकार बेरोजगारी में कमी का दावा कर रही है मगर आंकड़े कुछ अलग ही तस्वीर पेश करते हैं। गिग जॉब्स की मांग तेजी से बढ़ रही है मगर स्थिर नौकरियों की संख्या घट रही है। भारत की प्रमुख आईटी कंपनियां, जो कभी हर तिमाही में हजारों कर्मचारियों की भर्ती करती थीं। अब मुश्किल से कुछ ही लोगों को जोड़ रही हैं। सॉफ्टवेयर सेक्टर में ठहराव और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण बैकऑफिस नौकरियां संकट में हैं।

इसके अलावा लेबर-इंटेंसिव एक्सपोर्ट इंडस्ट्री भी गंभीर दबाव का सामना कर रही है। अमेरिकी बाजार में टैरिफ बढ़ने से भारतीय एक्सपोर्ट्स को नुकसान हो रहा है। जबकि यूरोपीय संघ के साथ कई एफटीए साइन किए गए हैं, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों से प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं होगा।

विकास की रफ्तार धीमी क्यों है?

हालांकि भारत की विकास दर मजबूत है फिर भी निजी निवेश की गति धीमी है। कॉर्पोरेट्स निरंतर जीडीपी का महज 12% ही निवेश कर रहे हैं। फैक्ट्रियों में ओवरकैपेसिटी की स्थिति बनी हुई है और नई डिमांड न होने के कारण नई फैक्ट्रियों की आवश्यकता नहीं महसूस हो रही। विदेशी निवेशक भी भारत से धन निकाल रहे हैं। ‘लाइसेंस राज’ की बुरी आदत अब भी बरकरार है। जमीन अधिग्रहण और श्रम कानूनों की जटिलताएं व्यापार को रोक रही हैं। इसके विपरीत, चीन और वियतनाम ने विदेशी निवेश को अपनी जीडीपी का 4% तक पहुंचा लिया है। वहीं भारत में यह आंकड़ा कभी 1.5% से ऊपर नहीं गया।

बजट में अपेक्षित सुधार

आगामी बजट में बड़ी राहत की उम्मीद कम है। वित्त मंत्री सुधारों और वित्तीय अनुशासन पर ज्यादा ध्यान देंगी। उम्मीद है कि पीएलआई स्कीम का विस्तार, एमएसएमई और एक्सपोर्टर्स को सहायता, कस्टम ड्यूटी में कटौती और रक्षा क्षेत्र के लिए पूंजीगत व्यय में बढ़ोतरी होगी। इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र में भारी निवेश जारी रहेगा, जिसमें सड़क, रेल और टेलीकॉम के लिए सालाना 100 बिलियन डॉलर का खर्च शामिल होगा। हालांकि, टैक्स और जीएसटी में कटौती से राजस्व पर दबाव पड़ सकता है इसलिए राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखना सरकार की प्राथमिकता होगी।

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क्या सुधार से बढ़ेगी विकास की दर?

कुल मिलाकर भारत की अर्थव्यवस्था सकारात्मक दिशा में बढ़ रही है मगर रोजगार, निर्यात और निवेश के मोर्चे पर गंभीर चुनौतियां सामने हैं। यदि सरकार इन क्षेत्रों में सुधार करने में सफल होती है, तो भारत का सपना एक सशक्त और आत्मनिर्भर सुपरपावर बनने का यकीनन पूरा हो सकता है।

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