यूपी की राजनीति में भूचाल; सपा ने चला ‘परशुराम कार्ड’, बीजेपी की बढ़ी टेंशन
यूपी की राजनीति में एक बार फिर ब्राह्मण वोट बैंक पर सियासी दलों की नजरें गड़ी हैं। इस बार समाजवादी पार्टी (सपा) ने यूपी में ब्राह्मणों को लुभाने के लिए एक नया मोर्चा खोला है। सपा विधायक कमाल अख्तर ने 19 अप्रैल को परशुराम जयंती को सार्वजनिक अवकाश घोषित करने की मांग उठाकर राजनीति में एक नया मोड़ लाया है। ये सिर्फ एक छुट्टी का सवाल नहीं बल्कि 2027 की विधानसभा चुनाव की तैयारी का हिस्सा माना जा रहा है।
सपा की नई पहल: ब्राह्मणों के समर्थन में उठाई मांग
कमाल अख्तर का कहना है कि परशुराम जयंती को सरकारी छुट्टी का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि यह केवल ब्राह्मण समाज का नहीं बल्कि सभी समाजों के लिए महत्वपूर्ण दिन है। उनका तर्क यह है कि पहले अखिलेश यादव की सरकार ने इस दिन को छुट्टी घोषित किया था, मगर बीजेपी सरकार ने इसे खत्म कर दिया। उनका कहना है कि छुट्टी नहीं होने से ब्राह्मण श्रद्धालुओं को परेशानी का सामना करना पड़ता है, क्योंकि वे निजी छुट्टी लेते हैं और व्यापारी अपने स्तर पर दुकानें बंद रखते हैं।
क्या बीजेपी को झटका देगा यह कदम
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज का वोट बैंक लगभग 10 से 12 प्रतिशत है और कई सीटों पर यह वोट निर्णायक साबित हो सकता है। 2007 में मायावती ने ब्राह्मणों के समर्थन से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, वहीं 2014 के बाद ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी में चला गया था। इस कारण से विपक्ष लगातार इस वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की कोशिश करता है।
सपा ने परशुराम जयंती का मुद्दा उठाकर एक नई राजनीतिक चाल चली है, जो बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती है। खास बात यह है कि यह मांग एक मुस्लिम विधायक ने उठाई है, जिससे यह संदेश दिया जा रहा है कि सपा हर वर्ग का सम्मान करती है।
विधानसभा में उठी यह मांग: सरकार का निर्णय क्या होगा?
सपा विधायक कमाल अख्तर की इस मांग को विधानसभा में चर्चा का विषय बना दिया है। विधानसभा अध्यक्ष ने इस मुद्दे को सरकार के निर्णय पर छोड़ दिया है और अब सभी की नजरें इस पर हैं कि सरकार इस पर क्या कदम उठाती है। अगर परशुराम जयंती को अवकाश घोषित किया जाता है, तो सपा इसे अपनी बड़ी जीत मान सकती है। वहीं, अगर सरकार इसे नकार देती है, तो विपक्ष इसे ब्राह्मणों की उपेक्षा का मुद्दा बना सकता है।
2027 के चुनाव में ब्राह्मण वोट की अहमियत
सपा की यह रणनीति बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। पहले ब्राह्मण सम्मेलन, फिर परशुराम प्रतिमा की स्थापना और अब जयंती को सरकारी अवकाश की मांग ये सारी बातें एक क्रम में दिखाई देती हैं। इन कदमों को देखकर लगता है कि अखिलेश यादव 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए ब्राह्मण वोट को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
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क्या मायावती की तरह सपा भी ब्राह्मणों को साधेगी
मायावती ने 2007 में ब्राह्मणों को अपनी ओर खींचकर सत्ता में प्रवेश किया था। कांग्रेस भी वक्त वक्त पर ब्राह्मणों को अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश करती रही है। ऐसे में सपा की यह चाल बीजेपी के लिए एक नई चुनौती बन सकती है, खासकर उस समय जब यूपी की राजनीति में ब्राह्मणों का वोट फिर से अहम हो गया है।
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परशुराम जयंती को लेकर विधानसभा में उठाई गई मांग यूपी की राजनीति में एक अहम मोड़ साबित हो सकती है। इस पर सरकार का फैसला ब्राह्मण समाज पर गहरा प्रभाव डाल सकता है। देखना होगा कि सरकार इस मुद्दे पर क्या कदम उठाती है और ब्राह्मण समाज इस पहल को किस दृष्टिकोण से देखता है।

