क्या ट्रंप की सनक UN को मिट्टी में मिला देगी, इतिहास में बना था ऐसा ही एक संगठन और ढह गया
USA-UN News: क्या आप जानते हैं कि दुनिया भर की समस्याओं को सुलझाने के लिए बनाई गई संस्था संयुक्त राष्ट्र (यूएन) कभी खत्म हो सकती है? यह सवाल आज की दुनिया में जब वैश्विक राजनीति में उथल-पुथल मची है, अचानक गंभीर हो गया है। खासकर जब अमेरिका जैसे राष्ट्रों के नेता जैसे डोनाल्ड ट्रंप दुनिया की एकजुटता को चुनौती दे रहे हैं और अपनी अलग वैश्विक रणनीतियों की बात कर रहे हैं। ये विचार एक ऐसे संगठन की ओर इशारा करता है जो इतिहास में एक बार पहले ही पथभ्रष्ट हो चुका है – लीग ऑफ नेशंस।
लीग ऑफ नेशंस के इतिहास पर एक नजर
सन् 1920 में प्रथम विश्व युद्ध के बाद विश्व ने एक उम्मीद के साथ लीग ऑफ नेशंस का गठन देखा था। स्विट्जरलैंड के जिनेवा में स्थित इस संगठन का उद्देश्य था सामूहिक सुरक्षा और वैश्विक सहयोग। युद्धों को रोकने के लिए एक मंच बनाना था, जहां सदस्य देश मिलकर एक-दूसरे के समर्थन में खड़े होते। यूएन के पहले विचारक अमेरिकी राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने इसका प्रपोजल रखा था। पहले तो ये संगठन प्रभावी दिखा लेकिन महज 20 साल में ये ढह गया।
लीग ने किए कई अहम कार्य, लेकिन विफलता क्यों
लीग ऑफ नेशंस ने कुछ अहम कार्य किए। उदाहरण के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का गठन जो मजदूरों के अधिकारों और कार्य समय को लेकर नियम बनाता है।
इसके अलावा शरणार्थियों की मदद और महामारियों से लड़ने में भी इसने योगदान दिया। हालांकि, इसके बावजूद यह संस्था लंबे समय तक टिक नहीं सकी।
लीग की विफलता के मुख्य कारण जानें
- अमेरिका का शामिल न होना: जिस देश ने इसकी स्थापना का विचार दिया, उसी ने इसमें भाग नहीं लिया। इससे संगठन को स्थिरता नहीं मिल पाई।
- सेना की कमी: लीग के पास कोई सैन्य ताकत नहीं थी। सदस्य देशों पर निर्भरता थी कि वे अपनी सेना देंगे, लेकिन नतीजा यह हुआ कि कोई भी देश गंभीर कदम उठाने के लिए तैयार नहीं था।
- वर्चस्ववादी निर्णय: बड़े देशों के प्रभाव में रहकर लिए गए फैसले लीग की निष्पक्षता को प्रभावित करते थे। जापान और इटली के हमलों के दौरान लीग निष्क्रिय रही।
क्या यूएन भी लीग ऑफ नेशंस का अनुसरण कर रहा है?
आज यूएन भी वही समस्याएं झेल रहा है जो लीग ऑफ नेशंस ने झेली थीं। रूस-यूक्रेन युद्ध और गाजा संकट जैसे मुद्दों में यूएन की भूमिका विवादास्पद रही है। विशेष रूप से वीटो पावर ने इसे पूरी दुनिया की चिंता का विषय बना दिया है। इसके अलावा, यूएन को मिलने वाली वित्तीय मदद में भी कमी आई है, जो पहले लीग की मृत्यु का कारण बनी थी। आज ट्रंप जैसे नेताओं के “अमेरिका फर्स्ट” जैसे सिद्धांतों का प्रभाव साफ़ नजर आता है।
संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा स्थिति से साफ़ है कि अगर बड़े देश अपनी जिम्मेदारियों को पूरी तरह से निभाने में विफल रहते हैं, तो इसका भविष्य भी लीग ऑफ नेशंस जैसा हो सकता है। यूएन में सुधारों की सख्त आवश्यकता है, खासकर वीटो पावर और वित्तीय मुद्दों के मामले में। साथ ही यदि वैश्विक शांति को बनाए रखने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हम फिर से उसी स्थिति में आ सकते हैं, जो द्वितीय विश्व युद्ध का कारण बनी थी।
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यूएन के सामने चुनौतियां और भी बढ़ सकती हैं खासकर तब जब बड़े राष्ट्रों का प्रभुत्व बढ़े और छोटे देशों की आवाज दब जाए। अगर यूएन को अपने उद्देश्य को बरकरार रखना है, तो उसे खुद को बदलने की जरूरत है। इतिहास की चेतावनियों को ध्यान में रखते हुए ये संस्था केवल शाब्दिक निंदा से आगे बढ़कर कार्यों में व्यावहारिक बदलाव की ओर अग्रसर हो ताकि भविष्य में वो एक और लीग ऑफ नेशंस न बन जाए।

