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बिहार के इन चार जिलों से 7.6 लाख वोटर लिस्ट से बाहर, रिपोर्ट से खुलासा

बिहार (Bihar) के सीमांचल (Seemanchal) क्षेत्र के चार प्रमुख जिलों अररिया (Araria), किशनगंज (Kishanganj), पूर्णिया (Purnia) और कटिहार (Katihar) में हाल ही में जारी प्रारंभिक मतदाता सूची (voter list) से लाखों नामों के हटाए जाने (name deletion) ने स्थानीय निवासियों को हैरानी में डाल दिया है। जहां सियासी दल इसे चुनावी रणनीति (election strategy) या निष्पक्षता की कसौटी पर तौल रहे हैं, वहीं आम लोगों के लिए यह सवाल बन गया है कि क्या वे अगली बार अपने मताधिकार (suffrage) का इस्तेमाल कर भी पाएंगे या नहीं।

लाखों नाम क्यों हटे, लेकिन कैसे political dispute

निर्वाचन कार्यलय (election office) की ओर से बताया गया है कि यह कार्रवाई उन लोगों के नाम हटाने के उद्देश्य से की गई जो या तो मृत घोषित हो चुके हैं, या जिनके नाम दोहरी प्रविष्टि (double entry) के रूप में दर्ज थे या फिर जिन्होंने अपना नाम किसी और क्षेत्र में स्थानांतरित (name transfer) करवा लिया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रक्रिया की जानकारी हर मतदाता तक समय रहते पहुंच पाई?
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अररिया (Araria) में 1.58 लाख, किशनगंज (Kishanganj) में करीब 1.45 लाख, पूर्णिया (Purnia) में 2.73 लाख और कटिहार (Katihar) में 1.84 लाख नाम हटाए गए हैं ये आंकड़े बताने को काफी हैं कि बदलाव छोटे स्तर पर नहीं हुआ बल्कि बड़े पैमाने पर हुआ है।
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राजनीतिक नजरिए से आगे, जनता के नज़रिए से देखें

यह इलाका लंबे समय से राजनीतिक रूप से संवेदनशील माना जाता है और यहां पर जातीय और धार्मिक संतुलन (muslim majority areas) भी काफी महीन है। लेकिन सूची से नाम हटने का असर अब केवल राजनीतिक विवाद (political dispute) और समीकरणों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि लोगों की पहचान, अधिकार (voter rights) और भरोसे (citizen confidence) से जुड़ गया है। ग्रामीण मतदाता (rural voters) क्षेत्रों में कई ऐसे लोग हैं जो अब भी यह नहीं समझ पा रहे कि उनका नाम क्यों और कैसे सूची से हटा दिया गया।

प्रक्रिया के पहले चरण में वोटरों को बूथ स्तर पर “गणना प्रपत्र” (counting form) दिए गए थे, जिन्हें दस्तावेज़ के साथ भरकर जमा करना था। लेकिन कई इलाकों में लोगों को ये फॉर्म समय पर नहीं मिले या उन्हें भरने का तरीका नहीं बताया गया। बीएलओ (BLO) के सहयोग में कमी, प्रशासनिक प्रक्रिया (administrative process) की जटिलता और डिजिटल प्रक्रिया (digital process) की सीमाओं के कारण कई लोगों का नाम हट गया। इस असंतुलन का खामियाज़ा अब आवाम को भुगतना पड़ रहा है।

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