पॉलिटिक्स

वोटर लिस्ट करेक्शन कैंप बना मज़ाक: न टेबल, न कुर्सी, अफसर भी नदारद

बिहार (Bihar) में मतदाता सूची (voter list) के बड़े फेरबदल के बाद लोगों की उम्मीदें और असमंजस दोनों बढ़ गए हैं। चुनाव आयोग (election commission) ने राज्य की वोटर लिस्ट (voter list) में व्यापक सफाई करते हुए करीब 65.64 लाख नाम हटाए (name removal) हैं, जिससे कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या 7.24 करोड़ रह गई है। आयोग ने ऐसे वोटरों के लिए सुधार शिविर (voter correction camp) लगाने का भरोसा दिया है ताकि वे अपना नाम पुनः दर्ज करा सकें। मगर इस दावे के बीच जमीन पर स्थिति कुछ और ही है खासकर बेगूसराय (Begusarai) जिले के चेरिया बरियारपुर (Cheria Bariarpur) प्रखंड में। voter correction camp

मीडिया की टीम जब वहां पहुंची, तो देखना था कि सुधार शिविर (voter correction camp) किस प्रकार संचालित हो रहे हैं मगर वहां का नजारा निराशाजनक था। प्रशासन द्वारा लगाए गए शिविर नाम मात्र के थे, जहां न तो किसी अधिकारी का ठिकाना था, न कोई सहायता के लिए मौजूद था। तीन घंटे तक टीम परिसर में रही, मगर एक भी बूथ लेवल अधिकारी (booth level officer, BLO) या चुनाव कर्मचारी (election employee) वहां नहीं मिला। इस खामोशी के बीच मतदाता असमंजस (voter confusion) में पड़ गए हैं।

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एक ऐसे ही मतदाता मोहम्मद शब्बीर आलम जो दूसरे जिले से अपना नाम वोटर लिस्ट (voter list) में जोड़वाने (name addition) आए थे। उन्होंने बताया कि उन्हें पहचान पत्र (identity card) और आधार कार्ड (Aadhaar card) लेकर बुलाया गया था मगर जब उन्होंने BLO (booth level officer) से संपर्क करने की कोशिश की तो पता चला कि यहां कोई शिविर लगा ही नहीं था। कई सरकारी कर्मचारी (government employee) भी कैमरे के सामने बहाने बनाने में लगे दिखे वे कहते हैं कि उन्हें शिविर लगने की सूचना नहीं मिली। ऐसे हालात में कई लोग दूर-दूर से आए मगर बिना मदद के वापस लौटे।

क्या लोकतांत्रिक अधिकारों (democratic rights) के साथ हो रहा है खिलवाड़

स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता (social worker) रामनरेश सिंह (Ramnaresh Singh) इस व्यवस्था की नाकामी (failure of system) पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि गरीब और मजदूर तबके के लोग अपने रोजगार छोड़ कर इन शिविरों में नाम जोड़वाने आते हैं, मगर जब व्यवस्थाएं इतनी ढीली हों, तो ये उनके लोकतांत्रिक अधिकारों (democratic rights) के साथ खिलवाड़ के समान है। वे कहते हैं कि न केवल समय और मेहनत बर्बाद हुई बल्कि कई लोगों का नाम बिना वजह हटाए जाने से वे चुनावी प्रक्रिया (election process) से वंचित (voter deprived) हो सकते हैं।

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