पत्नी को बंधक बताने पहुंचे पति को झटका, HC ने याचिका खारिज कर ठोका 25 हजार का जुर्माना
वैवाहिक विवादों की आड़ में पत्नी और बच्चे को अपनी ‘कस्टडी’ (Custody) में वापस लाने के प्रयास में एक व्यक्ति को ओडिशा हाईकोर्ट (Odisha High Court) से कड़ा झटका लगा है। अदालत ने उसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) को न केवल निराधार करार दिया बल्कि इस पर पच्चास हजार रुपए का फाइन (fine) भी ठोका। ये रकम अदालत ने परित्यक्त बच्चों के कल्याण (Welfare of Abandoned Children) हेतु खर्च करने का निर्देश दिया है।
इस पूरे मामले में याचिकाकर्ता (Petitioner) ने दावा किया था कि उसकी पत्नी (Wife) और नाबालिग पुत्र को जबरन उसके बहनोई द्वारा बंधक (Hostage) बनाया गया है। इसी आधार पर उसने बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट (Habeas Corpus Procedure) की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। मगर न्यायालय को यह याचिका केवल एक पूर्व-निर्धारित एजेंडा (Pre-Determined Agenda) का हिस्सा नज़र आई।
ये भी पढ़ें-जानें फांसी की सजा सुनाने वाले जज को कितनी सैलरी मिलती है
कोर्ट ने कहा, पत्नी कोई सम्पत्ति नहीं
मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन (Harish Tandon) और जज मुराहरि श्री रमन (Murhari Shree Raman) की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि किसी महिला को महज़ पति की इच्छा से बंधा हुआ जीवन जीने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि हर नागरिक को, चाहे वह किसी भी लिंग का हो, संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) प्राप्त हैं। एक पत्नी (Wife) भी अपने जीवन से जुड़े निर्णय स्वतंत्र रूप से लेने का हक रखती है। पति इस अधिकार को चुनौती नहीं दे सकता।
याचिका की मंशा पर उठा सवाल
याचिकाकर्ता (Petitioner) ने अपनी याचिका के साथ एक पुरानी शिकायत (Complaint) की प्रति संलग्न की थी, जो कथित तौर पर 30 अप्रैल 2025 को दर्ज की गई थी। उसने आरोप लगाया कि पुलिस (Police) ने उसकी शिकायत स्वीकार करने से इनकार कर दिया। हालांकि, जब अदालत ने गहराई से जांच की, तो यह स्पष्ट हुआ कि शिकायत कभी पुलिस के पास विधिवत रूप से प्रस्तुत ही नहीं की गई थी। (Habeas Corpus Petition)
ये भी पढ़ें-अब चेक जारी करते वक्त रहें सावधान, नया कानून बना सकता है आपको जेल का मेहमान
हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त शिकायत केवल इस याचिका को मजबूत करने के इरादे से बनाई गई थी। न्यायमूर्तियों ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता की ओर से कोई ऐसा प्रयास नहीं दिखा जो यह साबित कर सके कि उसने पुलिस अधिकारियों तक अपनी शिकायत पहुँचाने की गंभीर कोशिश की।
पुलिस से संपर्क के बाद सामने आई सच्चाई
याचिका पर संज्ञान लेते हुए जब पुलिस ने याचिकाकर्ता की पत्नी से संपर्क किया, तो उसने स्पष्ट रूप से यह कहा कि वह अपनी मर्जी से पति से अलग रह रही है। उसने वैवाहिक तनाव (Marital Tension) और मतभेदों की बात कही, जिसे अदालत ने गंभीरता से लिया।
ये भी पढ़े-शादी का झांसा और यौन शोषण, कानून कितना सख्त है; जानें सजा कितनी मिलती है
जजों ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने न्यायालय की बंदी प्रत्यक्षीकरण प्रक्रिया का दुरुपयोग (Misuse of Court) किया है, ताकि वह पत्नी पर नियंत्रण स्थापित कर सके और उसे एक ‘वस्तु’ (Object) की तरह पेश कर सके। उन्होंने कहा कि कोर्ट किसी को भी ऐसे हथकंडों से कानून की मर्यादाओं का उल्लंघन करने की अनुमति नहीं दे सकती।
झूठे मामलों से अदालत का समय बर्बाद न करें
खंडपीठ ने याचिका को गैर-जिम्मेदाराना और दुर्भावनापूर्ण करार देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में अदालत का समय नष्ट होता है, जिससे वास्तविक पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है। उन्होंने कहा कि झूठे मामले (False Cases) और बेमतलब के याचिकाओं के कारण कोर्ट टाइम (Court Time) बर्बाद होता है और इससे न्याय मिलने में बाधा आती है।

