आरएसएस @100: राष्ट्रनिर्माण के सौ वर्षों की यात्रा
अमित कुमार यादव
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) अपना शताब्दी वर्ष पूर्ण कर रहा है और इस अवसर पर संस्कृति मंत्रालय ने राष्ट्र सेवा के लिए विशेष डाक टिकट और स्मारक सिक्के जारी करने का निर्णय लिया है। किसी भी संगठन के लिए यह केवल सम्मान का क्षण नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय स्वीकृति है।
1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में जिस बीज को रोपा था, वह आज एक विराट वटवृक्ष बनकर भारतीय समाज और राजनीति के हर क्षेत्र में अपनी छाया फैला चुका है। संघ की यही धारा उसे विशिष्ट और अद्वितीय बनाती है।
वर्तमान सरसंघचालक मोहन भागवत ने हाल ही में कहा कि “संघ का कोई विरोधी हो सकता है, उससे असहमति रख सकता है, लेकिन उसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता।” यह कथन संघ की सौ वर्षों की यात्रा और उसकी व्यापक उपस्थिति का जीवंत प्रमाण है। संघ का ध्येय प्रारंभ से ही “संगठित, अनुशासित और संस्कारित समाज” के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण रहा है। शाखाएँ इस ध्येय की प्रयोगशाला रहीं, जहाँ से स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रशिक्षण, नैतिक शिक्षा और अनुशासन का संस्कार पाया। यही संस्कार उन्हें समाज सेवा, संगठन निर्माण और राष्ट्रीय जीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी की प्रेरणा देते रहे।
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गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर ने संघ की राष्ट्रदृष्टि को सैद्धांतिक आधार दिया। उनके विचारों ने यह स्थापित किया कि भारत केवल राजनीतिक इकाई ही नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक राष्ट्र है जिसकी आत्मा सनातन मूल्य एवं परंपराओं पर आधारित हैं और यही सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित परिकल्पना संघ के राष्ट्रनिर्माण की धुरी बनी। संघ की यात्रा में कठिनाइयाँ और परीक्षाएँ भी आईं।
सन् 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया, तो यह उसके लिए बड़ा आघात था। लेकिन संगठन ने संयम और धैर्य से काम लिया और अपनी गतिविधियों को सेवा, शिक्षा और समाजकार्य की दिशा में और व्यापक रूप से आगे बढ़ाया। 1975 का आपातकाल संघ की धैर्य और संगठन शक्ति की दूसरी परीक्षा थी। उस समय भी लाखों स्वयंसेवकों ने जेल की यातनाएँ सही और संघ ने लोकतंत्र की रक्षा के लिए अद्वितीय योगदान दिया। इतिहासकार मानते हैं कि आपातकाल के बाद भारतीय जनमानस में संघ की स्वीकृति और भी गहरी हुई।
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बालासाहेब देवरस का नेतृत्व संघ की यात्रा में एक नया मोड़ था। उन्होंने सामाजिक समरसता के विचार को संगठन का मूल मंत्र बनाने का प्रयास किया। दलितों, पिछड़ों और वंचित वर्गों तक पहुँचने और उन्हें संगठन में सक्रिय भूमिका देने का श्रेय उन्हें ही जाता है। इसी प्रकार दत्तोपंत ठेंगड़ी ने आर्थिक क्षेत्र में संघ की दृष्टि को दिशा दी। भारतीय मजदूर संघ और स्वदेशी जागरण मंच के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट किया कि राष्ट्रनिर्माण केवल सांस्कृतिक या राजनीतिक आयाम तक सीमित नहीं है, बल्कि उसमें आत्मनिर्भरता, श्रम सम्मान और आर्थिक स्वदेशीकरण का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है।
आज जब राष्ट्र आत्मनिर्भर भारत की ओर बढ़ रहा है, तब ठेंगड़ी की दृष्टि और भी प्रासंगिक प्रतीत होती है। दलित चिंतन और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में संघ प्रचारक रमेश पतंगे का योगदान भी उल्लेखनीय है उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया में समाज के हाशिए पर खड़े वर्गों की भागीदारी और सम्मान आवश्यक है। पतंगे का यह दृष्टिकोण संघ के भीतर समरसता के विमर्श को और मजबूत करता है।
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वर्तमान में मोहन भागवत के नेतृत्व में संघ ने सामाजिक समरसता को एक प्रमुख लक्ष्य के रूप में स्थापित किया है। कई मौकों पर उन्होंने स्पष्ट कहा कि जातिवाद भारतीय समाज की सबसे बड़ी समस्या है और इसके उन्मूलन के बिना राष्ट्रनिर्माण अधूरा है। इसी दृष्टि से संघ ने अपने “पंचपरिवर्तन” में समरसता को केंद्र में रखा है। संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति उनकी प्रतिबद्धता इस बात का संकेत है कि संघ भारतीय लोकतंत्र की मुख्यधारा में एक रचनात्मक शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को और सुदृढ़ करना चाहता है।
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संघ के राष्ट्रनिर्माण की परिकल्पना केवल सैद्धांतिक नहीं रही, बल्कि व्यवहारिक धरातल पर अनेक आयामों में प्रकट हुई है। शिक्षा के क्षेत्र में विद्या भारती की हजारों शालाएँ, आदिवासी और ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा भारती की पहल, स्वास्थ्य और आपदा राहत कार्यों में स्वयंसेवकों का समर्पण, ये सब संघ की राष्ट्र-सेवा की जीवंत गाथाएँ हैं।
अयोध्या आंदोलन ने भी संघ की दीर्घकालीन सांस्कृतिक परियोजना को मूर्त रूप दिया, जिसका परिणाम आज भव्य राम मंदिर के निर्माण के रूप में सबके सामने हैं।
इस प्रकार आरएसएस की सौ वर्षीय यात्रा राष्ट्रनिर्माण की एक जीवंत गाथा है।
यह केवल संगठन का इतिहास ही नहीं, बल्कि भारतीय समाज के संगठन और पुनर्निर्माण का इतिहास है। सेवा, समर्पण और समरसता के इन सौ वर्षों ने यह सिद्ध किया है कि संघ केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है।
शताब्दी वर्ष पर यह संगठन भारत के लिए एक नई ऊर्जा, नई दृष्टि और नए संकल्प का प्रतीक बनकर उभरा है।
(लेखक जेएनयू में राजनीतिक विज्ञान का शोधार्थी हैं और संघ के सामाजिक समरसता विषय के जानकार हैं)


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