Gandhi jayanti 2025: संविधान कहता है ‘नहीं’, देश कहता है हां; राष्ट्रपिता की उपाधि पर विवाद क्यों
Gandhi jayanti 2025: मोहन दास कर्मचंद गांधी को “राष्ट्रपिता” के रूप में जाना जाता है, उनको वास्तव में भारत सरकार द्वारा कभी औपचारिक रूप से यह उपाधि प्रदान नहीं की गई थी। ऐसा कोई कानून, सरकारी प्रस्ताव या संवैधानिक आदेश नहीं है जो उन्हें आधिकारिक तौर पर इस उपाधि से मान्यता देता हो। इसकी पुष्टि कई सूचना के अधिकार (आरटीआई) के जरिए से हुई है, जिसमें एक 10 वर्षीय छात्र द्वारा दायर की गई आरटीआई भी शामिल है, जिससे पता चला कि बापू को ये उपाधि प्रदान करने वाला कोई आधिकारिक साक्ष्य मौजूद नहीं है।
इसकी संवैधानिक वजह अनुच्छेद 18(1) है जो भारतीय राज्य को शिक्षा या सैन्य सम्मान से संबंधित उपाधियों को छोड़कर, किसी भी तरह की उपाधि प्रदान करने से रोकता है। तो वहीं यदि राजनीतिक नेता इस सम्मान को औपचारिक रूप देना भी चाहते हों, तो संविधान इसकी इजाजत नहीं देता।
बता दें कि 2 अक्टूबर 2025 को Gandhi jayanti पूरे देश में मनाई जा रही है। ऐसे में आईये जानते हैं उनको राष्ट्रपिता क्यों कहा जाने लगा।
कैसे हुई इस शब्द की उत्पत्ति
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक “राष्ट्रपिता” शब्द पहली बार आजादी की लड़ाई के दौरान बापू के नेतृत्व के प्रति सम्मान और तारीफ के प्रतीक के रूप में सामने आया था। इसका सबसे पहला जिक्र सुभाष चंद्र बोस द्वारा किया गया है, जिन्होंने 6 जुलाई 1944 को सिंगापुर से एक रेडियो प्रसारण में बापू को “हमारे राष्ट्रपिता” के रूप में बताया था। तत्पश्चात, सरोजिनी नायडू ने 28 अप्रैल 1947 को सार्वजनिक रूप से इस उपाधि का इस्तेमाल किया। ये प्रारंभिक प्रयोग औपचारिक मान्यता के बजाय लोकप्रिय श्रद्धा की अभिव्यक्ति थे।
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राष्ट्रपिता की उपाधि और चाचा नेहरू की भूमिका
30 जनवरी 1948 को बापू के हत्या के बाद ये शब्द भारतीय जनमानस में गहराई से समा गया। पूर्व पीएम नेहरू ने राष्ट्र को संबोधित करते हुए कहा कि राष्ट्रपिता अब नहीं रहे। इससे इस वाक्यांश को भावनात्मक बल मिला और राजनीतिक विमर्श, पाठ्यपुस्तकों और मीडिया संदर्भों में इसका इस्तेमाल और भी पुख्ता हो गया। वक्त के साथ ये शब्द भारत में Gandhi Ji का पर्याय बन गया है, जो उनकी कानूनी स्थिति को नहीं बल्कि जनता की तारीफ और देश के स्वतंत्रता संग्राम में उनकी प्रतीकात्मक भूमिका को बताता है।
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आज भी क्यों गूंजता है ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान
आधिकारिक मान्यता न होने के बाद भी ये सम्मान इसलिए गूंजता है क्योंकि भारत के स्वतंत्रता लड़ाई में Gandhi Ji का नेतृत्व अनोखा था। उन्होंने अहिंसक सविनय अवज्ञा (सत्याग्रह) का बीड़ा उठाया, देश भर में जनसमूह को संगठित किया और राष्ट्रीय आंदोलन का नैतिक और सियासी चेहरा बन गए।
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इतिहासकार विनय लाल के साथ साथ कई विद्वान बताते हैं कि Father of the Nation सम्मान भारत की सामूहिक स्मृति में लगभग पवित्र हो गया है और ये बापू के नैतिक अधिकार और आधुनिक भारत को आकार देने में उनकी केंद्रीय भूमिका का प्रतीक है।

