मिट गया अमेरिका का अहंकार, 9 साल बाद ‘दुश्मन’ के दर पर क्यों पहुंचे डोनाल्ड ट्रंप?
वक्त वाकई बड़ा बलवान होता है। समय खराब आने पर ताकत और अहंकार चूर-चूर होने में देर नहीं लगती। वक्त के आगे ‘तीसमारखां’ को भी घुटनों पर आना पड़ जाता है। अब देखिए ना दुनिया के दो सुपर पावर देशों के साथ समय ने कैसा ‘खेला’ कर डाला है। रूस के बाद अमेरिका की अर्थव्यवस्था डांवाडोल होने लगी है। एक दौर वह था, जब मास्को और वाशिंगटन को आंखें दिखाने की हिम्मत किसी में नहीं होती थी।
चीन दौरे पर ट्रंप
रूस के पास आज भी परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा है। इसके बाद नंबर दो पर अमेरिका आता है। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से वाशिंगटन पूरे विश्व में नंबर एक पर है। डॉलर को चुनौती देने की हिम्मत किसी देश की मुद्रा में नहीं है, मगर वर्तमान में रूस व अमेरिका की स्थिति बदल चुकी है। पहले बात अमेरिका की। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों चीन के दौरे पर हैं।
दोनों देशों के बीच लंबे समय से छत्तीस का आंकड़ा है। एक पूरब है तो दूसरा पश्चिम। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने चीन को परेशान करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। दूसरे यानी मौजूदा कार्यकाल में भी वह बीजिंग पर मनमाना टैरिफ लागू करते रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग के मध्य समय-समय पर तीखी जुबानी जंग देखने को मिलती रही है।
फिलवक्त समय ने ऐसी करवट ली है कि अमेरिकी राष्ट्रपति को खुद चीन जाना पड़ा है। पिछले नौ साल के भीतर अमेरिका के किसी राष्ट्राध्यक्ष की यह पहली बीजिंग यात्रा है। ट्रंप को जिनपिंग के दर पर जाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे कुछ अहम कारण हैं। अमेरिका और ईरान के बीच गहरे मतभेद चल रहे हैं। इजरायल के साथ मिलकर भी वह तेहरान को दबाने में पूर्णत: असफल रहा है। मुख्य समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य अब तक खुल नहीं पाया है। इससे पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट की मार झेलनी पड़ रही है।
ईरान पर ट्रंप की धमकियां बेअसर
डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का तेहरान पर रत्ती भर असर नहीं पड़ा है। उलटा वह अमेरिका को आंखें दिखाने पर उतर आया है। ईरान और चीन की दोस्ती काफी गाढ़ी है। ट्रंप को लगता है कि बीजिंग के जरिए वह ईरान को रास्ते पर लाने में कामयाब हो सकता है। इसी मकसद से भी ट्रंप को वहां जाना पड़ा है। मिडिल ईस्ट युद्ध में मुंह की खाने के कारण अमेरिका की खूब जग हंसाई हो रही है। उसके सहयोगी देश भी वाशिंगटन की ताकत को समझ चुके हैं। उधर, कुछ साल पहले रूस ने आवेश में आकर यूक्रेन पर हमला कर दिया था।
मास्को को उम्मीद थी कि कुछ दिनों के अंदर वह यूक्रेन को पराजित कर खुद को विजेता घोषित कर देगा, मगर दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। इसके बाद वह युद्ध में ऐसा उलझा कि उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। अर्थव्यवस्था कमजोर होने के अलावा मास्को से मूल नागरिकों ने पलायन शुरू कर दिया था। उन्हें डर यह था कि कहीं उन्हें जबरन युद्ध मैदान में धकेल न दिया जाए। वर्तमान में अमेरिका और रूस की हालत कमोबेश एक जैसी है।
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युद्ध के दरम्यान रूस को चीन की शरण में जाना पड़ा था। वही स्थिति अमेरिका की बन गई है। ऐसे में विश्व स्तर पर चीन की छवि और ताकत को बल मिला है। बगैर युद्ध लड़े वह सबसे बड़े यौद्धा के तौर पर उभरा है। चीन के रिश्ते रूस, नॉर्थ कोरिया और ईरान से काफी अच्छे हैं। यह तीनों देश अमेरिका के दुश्मनों की लिस्ट में सबसे ऊपर माने जाते हैं।

