कपड़ा से हैंडीक्राफ़्ट तक, जानें ट्रंप टैरिफ से कैसे प्रभावित होंगे भारतीय उद्योग
अंतरराष्ट्रीय व्यापार की बिसात पर अमेरिका ने एक बार फिर से बड़ा दांव खेला है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आने वाले निर्यात पर 50 फ़ीसदी तक का टैरिफ लागू कर दिया है। ये कदम सीधे तौर पर भारत के कपड़ा, चमड़ा, झींगा, जूते और हैंडीक्राफ़्ट जैसे उद्योगों को चोट पहुंचा रहा है वे उद्योग जो न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था को मजबूती देते हैं, बल्कि लाखों लोगों के रोज़गार का सहारा भी हैं।
क्यों लगाया गया ट्रंप टैरिफ
वाशिंगटन का तर्क है कि भारत के साथ अमेरिका का व्यापार घाटा निरंतर बढ़ रहा है। इसी को दुरुस्त करने के लिए 25 फ़ीसदी का टैरिफ लगाया गया। इसके अलावा रूस से सस्ते तेल की खरीद को लेकर भी ट्रंप प्रशासन ने भारत पर 25 फ़ीसदी की पेनल्टी ठोंकी। इस तरह कुल 50 फ़ीसदी का बोझ सीधे भारतीय निर्यात पर आ पड़ा है।
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हालांकि कुछ चुनिंदा उत्पादों को राहत दी गई है, लेकिन अनुमान है कि भारत का 60 फ़ीसदी से ज़्यादा निर्यात अब इस टैरिफ की चपेट में आ चुका है।
भारतीय उद्योगों पर असर
- सबसे बड़ा असर छोटे और मझोले उद्योगों पर पड़ने वाला है।
- कपड़ा उद्योग: पहले से ही मंदी और प्रतिस्पर्धा झेल रहा यह क्षेत्र अब अमेरिकी बाज़ार में और महंगा पड़ जाएगा।
- लेदर व जूता उद्योग: उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों में लाखों कारीगर इससे प्रभावित होंगे।
- हैंडीक्राफ़्ट: भारतीय कारीगरों की मेहनत से तैयार कलाकृतियां और आभूषण अब अमेरिकी उपभोक्ताओं तक महंगे दामों पर पहुंचेंगे, जिससे मांग घटने की आशंका है।
इकोनॉमिक टाइम्स में छपी रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी निवेश फर्म जैफ़रीज़ के रणनीतिकार क्रिस वुड का कहना है कि भारत को इस फैसले से 55 से 60 अरब डॉलर तक का नुकसान हो सकता है। उनके मुताबिक़, “टेक्सटाइल, जूते और हैंडीक्राफ़्ट उद्योग तबाही के कगार पर पहुंच सकते हैं।”
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ट्रंप टैरिफ है दमनकारी फैसला
- अमेरिकी अर्थशास्त्रियों में इस कदम को लेकर मतभेद है।
- कुछ इसे ट्रंप का “दमनकारी फैसला” बता रहे हैं।
- वहीं, कुछ का मानना है कि इससे भारत को नए बाज़ार तलाशने का दबाव बढ़ेगा और वैश्विक व्यापार में अवसर भी मिल सकते हैं।
- दिलचस्प बात यह है कि इन टैरिफ का असर भारत के आईटी और सर्विस सेक्टर पर नहीं पड़ेगा, जो पहले से ही अमेरिका में मजबूत उपस्थिति रखते हैं।
ट्रंप की व्यक्तिगत नाराज़गी
क्रिस वुड का तर्क है कि ये कदम महज़ आर्थिक कारणों से नहीं बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप की व्यक्तिगत नाराज़गी का नतीजा है। रूस से तेल खरीदने पर अमेरिका की खीझ पहले से सामने आ चुकी है और अब यह टैरिफ वॉर उसी का विस्तार है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यह खींचतान लंबी चली तो दोनों देशों के हितों पर गहरा असर पड़ेगा।


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