Bakrid 2026: सिर्फ जानवर काटना ही नहीं, बल्कि… जानिए क्या कहता है इस्लाम!
Blessed eid al-adha 2026: ईद उल अजहा जिसे बकरीद और बड़ी ईद भी कहा जाता है इस साल 28 मई को मनाई जाएगी। मुस्लिम समाज में इस त्योहार को लेकर तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। हालांकि यह पर्व केवल कुर्बानी तक सीमित नहीं माना जाता बल्कि इसका मकसद समाज में भाईचारा और मदद की भावना को बढ़ाना भी है।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि ईद उल अजहा लोगों को अपने व्यवहार और सोच को बेहतर बनाने की सीख देती है। इस मौके पर इंसान को लालच, नफरत और गलत आदतों से दूर रहने का संदेश दिया जाता है।
ईमानदारी की कमाई को दी जाती है अहमियत
इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार हज और कुर्बानी उसी व्यक्ति के लिए बेहतर मानी जाती है जिसकी कमाई मेहनत और ईमानदारी से हुई हो। उधार लेकर हज या कुर्बानी करना जरूरी नहीं बताया गया है।
धर्म विशेषज्ञों के मुताबिक इंसान को सबसे पहले अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करने की कोशिश करनी चाहिए। तभी इबादत का सही अर्थ पूरा होता है।
इसी वजह से हर मुस्लिम हज या कुर्बानी नहीं कर पाता। लेकिन त्योहार की खुशी में हर व्यक्ति अपनी क्षमता के हिसाब से शामिल हो सकता है।
जरूरतमंदों तक पहुंचती है कुर्बानी की खुशी
ईद उल अजहा में कुर्बानी के बाद मांस को तीन हिस्सों में बांटने की परंपरा निभाई जाती है। एक हिस्सा परिवार के लिए रखा जाता है। दूसरा रिश्तेदारों और करीबियों को दिया जाता है। तीसरा हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जाता है।
इस परंपरा का उद्देश्य यह है कि त्योहार की खुशी केवल एक घर तक सीमित न रहे बल्कि समाज के हर वर्ग तक पहुंचे।
नमाज के बाद निभाई जाती है कुर्बानी की परंपरा
ईद के दिन सुबह लोग ईदगाह और मस्जिदों में नमाज अदा करते हैं। इसके बाद कुर्बानी की रस्म पूरी की जाती है। इस्लामिक मान्यताओं में इसे हजरत इब्राहिम की सुन्नत माना गया है। इसे जरूरी फर्ज की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया है।
इस्लाम में बताए गए हैं पांच जरूरी फर्ज
धर्म विशेषज्ञों के अनुसार इस्लाम में पांच मुख्य फर्ज बताए गए हैं। इनमें कलमा, नमाज, रमजान के रोजे, जकात और हज शामिल हैं।
इनमें कलमा, नमाज और रोजे हर मुस्लिम के लिए जरूरी माने जाते हैं। वहीं जकात और हज के लिए आर्थिक स्थिति मजबूत होना जरूरी माना गया है। अगर किसी व्यक्ति पर कर्ज हो या पारिवारिक जिम्मेदारियां ज्यादा हों तो वह पहले उन्हें पूरा करता है।
कुर्बानी का मतलब केवल जानवर नहीं
धार्मिक विद्वानों का कहना है कि कुर्बानी का असली मतलब सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना नहीं है। इंसान को अपने अंदर के घमंड, ऊंच-नीच और धन के अहंकार को भी छोड़ना चाहिए।
इसी सोच के कारण ईद उल अजहा को आत्म सुधार और समाज सेवा का त्योहार भी कहा जाता है।
दूसरों की मदद को भी माना गया इबादत
ईद उल अजहा का सबसे बड़ा संदेश जरूरतमंद लोगों की सहायता करना है। अगर कोई व्यक्ति हज या कुर्बानी करने में सक्षम नहीं है तो भी वह गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करके इस त्योहार की भावना को अपना सकता है।
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यही कारण है कि बकरीद को केवल धार्मिक पर्व नहीं बल्कि इंसानियत और साझेदारी का त्योहार भी माना जाता है।

