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भेष बदलकर निकले मंत्री, कंडक्टर ने बस से उतारा और ऑटो वाले ने वसूला ज्यादा किराया; अब एक्शन में सरकार

रोजमर्रा की जिंदगी में आम नागरिकों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट (Public Transport) से सफर के दौरान ढेरों छोटी-बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बस हो अथवा ऑटो, प्रतिदिन यात्रियों को कुछ न कुछ कड़वे अनुभव जरूर मिलते हैं। कभी ड्राइवर या कंडक्टर का व्यवहार मर्यादित नहीं होता, तो कभी निर्धारित से कई गुना अधिक किराया चुकाना पड़ जाता है। इस खराब व्यवहार या मनमाने किराए पर बहस करने का भी कोई फायदा नहीं होता, क्योंकि ड्राइवर-कंडक्टर अक्सर कायदे की बात सुनने को राजी नहीं होते।

लेकिन सोचिए, जब खुद सूबे का परिवहन मंत्री आम आदमी बनकर सड़कों पर उतरे और उसे भी यही सब झेलना पड़े? ऐसा ही एक बेहद दिलचस्प और आंखें खोलने वाला वाकया कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में सामने आया है, जहां खुद परिवहन मंत्री बायराथी सुरेश (Byrathi Suresh) को व्यवस्था के इस कड़वे सच से दो-चार होना पड़ा।

चेहरे पर मास्क और आम मुसाफिर का भेष: 2 घंटे में किया 10 बसों का सफर

प्राचीन काल में जनता की जमीनी परेशानियों और हकीकत को करीब से जानने के लिए राजा-महाराजा भेष बदलकर रात्रि में औचक निरीक्षण पर निकलते थे। 21वीं सदी के हाईटेक दौर में कर्नाटक के परिवहन मंत्री बायराथी सुरेश ने भी ठीक ऐसा ही किया। मंत्री जी ने बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम (BMTC) की बसों और स्थानीय ऑटो में अपनी पहचान छुपाकर सफर किया, ताकि वे उन तकलीफों को नजदीक से जान-समझ सकें, जिन्हें आम मुसाफिर रोजाना झेलते हैं।

परिवहन मंत्री ने लगभग दो घंटे तक बेंगलुरु की सड़कों पर बीएमटीसी की 10 अलग-अलग बसों में सफर किया। इस दौरान पहचान छुपाए रखने के लिए उन्होंने अपने चेहरे को एक साधारण मास्क से ढक रखा था।

100 रुपए का छुट्टा नहीं था, तो कंडक्टर ने मंत्री को बीच रास्ते उतारा

इस औचक निरीक्षण के दौरान जो सबसे हैरान करने वाली हकीकत सामने आई, उसने परिवहन विभाग के दावों की पोल खोलकर रख दी। सफर के दौरान जब मंत्री जी ने टिकट के लिए ₹100 का नोट निकाला, तो खुले पैसे (Change) न होने का हवाला देकर बस कंडक्टर ने उनके साथ रूखा व्यवहार किया। हद तो तब हो गई जब छुट्टा न होने पर कंडक्टर ने खुद परिवहन मंत्री को ही बीच रास्ते में बस से बाहर का रास्ता दिखा दिया। मंत्री जी ने भी अपनी पहचान उजागर किए बिना और कोई बहस किए बिना चुपचाप बस से उतरना ही बेहतर समझा।

इसके अलावा, निरीक्षण के दौरान एक अन्य जगह पर यात्रियों को देखकर भी बस न रोकने और लापरवाही बरतने के मामले में मंत्री ने कड़ा रुख अपनाते हुए संबंधित बस के ड्राइवर और कंडक्टर को मौके पर ही सस्पेंड करने का आदेश जारी कर दिया।

ऑटो वाले ने भी की मनमानी, वसूला जबरन एक्स्ट्रा किराया

बसों के बाद मंत्री जी का ऑटो सफर का अनुभव भी आम नागरिकों से अलग नहीं रहा। जब उन्होंने एक सामान्य यात्री की तरह ऑटो किराए पर लिया, तो ऑटो चालक ने नियमों को ताक पर रखकर मीटर से चलने से साफ मना कर दिया और निर्धारित से कहीं अधिक किराया जबरन वसूल लिया।

कर्नाटक में परिवहन मंत्री के इस औचक और सीक्रेट दौरे ने जहां पूरे परिवहन महकमे में हड़कंप मचा दिया है, वहीं आम जनता ने इसे सोशल मीडिया पर एक बेहद शानदार और अनुकरणीय पहल बताया है। कम से कम इस दौरे से परिवहन मंत्री को जमीनी हकीकत का यह अहसास तो हो गया कि उनके विभाग के कर्मचारी आम जनता के साथ कैसा बर्ताव करते हैं।

देशभर के सार्वजनिक परिवहन का यही है रोना: डग्गामार बसें और मनमाना किराया

बेंगलुरु की सड़कों पर बस और ऑटो से जुड़ी जो गंभीर समस्याएं सामने आई हैं, वह केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे देश के हर छोटे-बड़े शहर में देखने को मिलती हैं। सरकारी रोडवेज बसों में अक्सर ड्राइवर एवं कंडक्टर की मनमानी और निर्धारित स्टैंड पर बसें न रोकने की शिकायतें आम हैं।

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इससे भी बदतर हालत निजी और अवैध (डग्गामार) बसों की है। अधिक कमाई के फेर में इन डग्गामार बसों में यात्रियों को जानवरों की भांति ठूंस-ठूंस कर चढ़ा लिया जाता है। ये बसें मुख्य रोडवेज बस स्टैंड के ठीक बाहर अवैध रूप से खड़ी होकर जगह-जगह रुकती हैं, जिससे न सिर्फ लंबा ट्रैफिक जाम लगता है बल्कि सरकारी परिवहन विभाग की आय को भी भारी चपत लगती है। दूसरी ओर, शहर के ऑटो चालक भी मनमाने ढंग से किराया बढ़ाने और तय रूट्स पर चलने से इनकार करने में पीछे नहीं हैं।

जनप्रतिनिधियों के लिए मिसाल: वीआईपी कल्चर छोड़ जमीन पर उतरना जरूरी

आधुनिक जनतंत्र में ज्यादातर जनप्रतिनिधियों या मंत्रियों के तथाकथित ‘औचक निरीक्षण’ से कई दिन पहले ही संबंधित महकमे और अधिकारियों को पूरे कार्यक्रम की पल-पल की जानकारी मिल जाती है। नतीजा यह होता है कि अफसर आनन-फानन में कागजों और व्यवस्थाओं को चमका लेते हैं और मंत्री जी को सब कुछ ऑल इज वेल (All is Well) नजर आता है।

बेंगलुरु के परिवहन मंत्री बायराथी सुरेश ने जिस तरह बिना किसी सुरक्षा तामझाम और लाव-लश्कर के जमीन पर उतरकर सच देखा, वह देश के अन्य राज्यों के मंत्रियों और अधिकारियों के लिए भी एक बड़ी मिसाल है। जब तक शासक खुद प्रजा बनकर दर्द नहीं झेलेगा, तब तक व्यवस्थाओं में वास्तविक सुधार आना नामुमकिन है।

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