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जाटव vs गैर-जाटव दलित: यूपी की 66 जातियों को साधने के लिए अखिलेश यादव ने बनाया डिजिटल प्लान

UP Election 2027 Preparation: यूपी में मुख्यमंत्री चुनाव की जंग फतह करने की तैयारी में जुटे समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख अखिलेश यादव ने अपने जन्मदिन के खास मौके पर बुधवार को पार्टी का हाईटेक डिजिटल सदस्यता अभियान लॉन्च कर दिया है। लखनऊ स्थित प्रदेश कार्यालय से शुरू हुए इस अभियान के तहत अखिलेश यादव ने हर बूथ पर 50 नए सदस्य बनाने का बड़ा लक्ष्य रखा है। उन्होंने घोषणा की कि अब समाजवादी पार्टी के आधिकारिक ऐप के जरिए ‘ऑनलाइन’ सदस्यता ग्रहण की जा सकेगी।

खास बात यह रही कि इस डिजिटल अभियान की पहली सदस्य दलित समुदाय से आने वाली अंजलि और उनका परिवार बना। अंजलि को सदस्य बनाकर अखिलेश यादव ने यूपी की राजनीति में एक तीर से कई निशाने साधे हैं।

भंडारे की सियासत से डिमोशन तक: अंजलि और अखिलेश की पूरी कहानी

दरअसल, यह पूरा मामला इसी साल 14 अप्रैल का है, जब बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर जयंती और बैसाखी के मौके पर लखनऊ के सदर गुरुद्वारे के पास रहने वाली अंजलि मैसी के पिता उमेश कुमार ने एक भंडारे का आयोजन किया था। गुरुद्वारे में मत्था टेककर बाहर निकले अखिलेश यादव से अंजलि ने प्रसाद खाने का अनुरोध किया, जिसे स्वीकार करते हुए अखिलेश ने वहीं रुककर पूड़ी-सब्जी खाई थी। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुआ था।

अंजलि का आरोप है कि अखिलेश यादव को भंडारा खिलाने की गाज उनके पिता उमेश कुमार पर गिरी, जो छावनी परिषद (कैंटोनमेंट बोर्ड) में सुपरवाइजर के पद पर तैनात थे। उन्हें अगले ही दिन पद से डिमोट करके सीधे सफाई कर्मचारी बना दिया गया। इसके बाद अखिलेश यादव ने अंजलि और उनके परिवार को सपा दफ्तर बुलाकर सम्मानित किया था और प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। तब अंजलि ने कहा था कि “मेरे पिता ने संदेश भेजा है कि अखिलेश जी के लिए ऐसी सौ नौकरियां कुर्बान।”

“वक्त बदलने पर पूरा सम्मान वापस दिलाएंगे” – अखिलेश यादव

अपने जन्मदिन पर अंजलि और उनकी माता को पहला डिजिटल सदस्य बनाने के बाद अखिलेश यादव ने भावुक और आक्रामक अंदाज में कहा:

“डिजिटल सदस्यता अभियान की शुरुआत हम अंजलि जी को पार्टी का सदस्य बनाकर कर रहे हैं। हमारे बुलावे पर आने और मुझे भंडारा खिलाने के कारण इन्हें काफी सामाजिक और राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा। जिन लोगों का भी इस सरकार में सम्मान छीना गया है, हम हर स्तर पर उनकी आवाज उठाएंगे और वक्त बदलने पर उन्हें पूरा सम्मान वापस दिलाएंगे।”

अखिलेश ने देश और प्रदेश के युवाओं तथा जागरूक नागरिकों से अपील की है कि वे ‘सपा ऐप’ के माध्यम से घर बैठे खुद भी सदस्य बनें और दूसरों को भी जोड़ें। उन्होंने कहा कि नए सदस्य ‘संपर्क, संवाद और सहायता’ के जरिए सामाजिक न्याय का राज लाने और देश को बंधुराष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करेंगे।

मिशन 2027: ‘पीडीए’ फॉर्मूले और दलितों पर सपा का पूरा फोकस

सपा प्रमुख ने अपने इस डिजिटल अभियान की शुरुआत के लिए जानबूझकर दलित समुदाय को चुना है, जो 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव के लिए एक बड़ा सियासी संदेश है। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली प्रचंड जीत के बाद सपा लगातार अपने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) फॉर्मूले को धार दे रही है।

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हाल ही में अखिलेश यादव ने संगठन स्तर, फ्रंटल यूनिट्स और टिकट बंटवारे में दलितों और अति-पिछड़ों की भागीदारी को तेजी से बढ़ाया है। इस रणनीति का बड़ा फायदा लोकसभा चुनाव में दिखा, जहां सपा ने उत्तर प्रदेश की 17 अनुसूचित जाति (SC) आरक्षित सीटों में से 7 पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। अब इसी मिशन को आगे बढ़ाते हुए सपा का पूरा ध्यान दलितों को स्थाई रूप से पार्टी से जोड़ने पर है।

यूपी का जातिगत समीकरण: 22% दलित आबादी और सत्ता की चाबी

उत्तर प्रदेश की सियासत में ओबीसी वर्ग के बाद दूसरी सबसे बड़ी ताकत दलित समुदाय की है, जिसकी कुल आबादी लगभग 22 फीसदी है। यह वोटबैंक दो मुख्य हिस्सों में बंटा है:

  • जाटव समुदाय: कुल दलित आबादी का 56% हिस्सा (लगभग 12% कुल वोटबैंक) जाटव समाज का है। बसपा प्रमुख मायावती और भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर इसी समाज से आते हैं।

  • गैर-जाटव दलित: शेष 44% हिस्सा (लगभग 10% कुल वोटबैंक) गैर-जाटव जातियों का है, जिसमें पासी (16%), धोबी, कोरी और वाल्मीकि (15%), और गोंड, धानुक व खटीक (5%) शामिल हैं। इसके अलावा मुसहर, बसोर, सपेरा जैसी 55 अन्य छोटी उपजातियां भी इसमें शामिल हैं।

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा जाटव केंद्रित रही है, लेकिन मायावती के दौर के बाद गैर-जाटव दलितों ने अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं के लिए अन्य विकल्प तलाशने शुरू कर दिए थे। लोकसभा चुनाव में सपा इस वोटबैंक में बड़ी सेंध लगाने में कामयाब रही थी। अब अखिलेश यादव इसी सोशल इंजीनियरिंग के दम पर 2027 में समाजवादी पार्टी के सत्ता का वनवास खत्म करना चाहते हैं।

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