PDA छोड़ अब ‘सनातन’ की शरण में अखिलेश, 2027 चुनाव से पहले सपा के इस नए अवतार ने उड़ाए BJP के होश
उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस समय सबसे बड़ी हलचल किसी नए गठबंधन को लेकर नहीं बल्कि समाजवादी पार्टी के बदले हुए तेवरों को लेकर मची है। जो पार्टी अब तक पूरी तरह से पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण पर निर्भर थी, वह अचानक सनातन परंपरा, संत समाज और धार्मिक विषयों पर बेहद मुखर दिखाई दे रही है।
जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के चरणों में बैठकर आशीर्वाद लेते अखिलेश यादव की तस्वीर हो या फिर राम मंदिर के चढ़ावे से जुड़ा विवाद, सपा अब हर उस मुद्दे पर हाथ आजमा रही है जिसे कभी बीजेपी की पिच माना जाता था। राजनीतिक पंडित इसे 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले का सबसे बड़ा दांव मान रहे हैं।
लोकसभा की सफलता के बाद विधानसभा की जमीनी हकीकत का आकलन
साल 2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी को मिली ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनका वही पुराना पीडीए फॉर्मूला था जिसने दलित, पिछड़े और मुस्लिम मतदाताओं का एक मजबूत ध्रुवीकरण तैयार किया। इस रणनीति ने सपा को सूबे की सबसे बड़ी पार्टी तो बना दिया मगर 2027 की जमीनी लड़ाई बिल्कुल अलग होने वाली है।
सूबे की कुल आबादी में करीब 20 फीसदी दलित, 45 फीसदी ओबीसी, 19 फीसदी मुस्लिम और लगभग 20 फीसदी सवर्ण वोटर हैं। विधानसभा चुनाव में सिर्फ एकतरफा सामाजिक गणित के भरोसे सत्ता की चाबी हासिल करना मुमकिन नहीं है। येी कारण है कि अखिलेश यादव अब अपने पुराने वोट बैंक को सुरक्षित रखते हुए सवर्ण और हिंदू समाज के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।
राम मंदिर विवाद पर सधा हुआ रुख और संत समाज से नजदीकी
अखिलेश यादव ने हाल के दिनों में अपनी राजनीतिक भाषा में एक बड़ा बदलाव किया है। राम मंदिर से जुड़े वित्तीय विवादों पर उन्होंने सरकार को जमकर घेरा मगर उनकी शब्दावली ऐसी थी जिससे लोगों की धार्मिक आस्था को कोई ठेस न पहुंचे। उनका पूरा ध्यान भ्रष्टाचार के आरोपों पर रहा न कि मंदिर की व्यवस्था पर।
इसके तुरंत बाद शंकराचार्य से मुलाकात कर ये कहना कि वे संतों के मार्गदर्शन पर चलेंगे, एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी के दफ्तरों के बाहर अब ऐसे पोस्टर भी दिखने लगे हैं जिन पर लिखा है कि सनातन ही समाजवाद है। भगवान परशुराम की मूर्तियों की स्थापना से शुरू हुआ ये सफर अब गौ रक्षा और धार्मिक परंपराओं पर संतुलित बयानबाजी तक पहुंच चुका है।
हिंदुत्व के गढ़ में सेंध लगाने की चुनौती और बड़ा राजनीतिक जोखिम
सपा का ये नया अवतार जितना आकर्षक दिख रहा है, उसमें चुनौतियां और खतरे भी उतने ही बड़े हैं। उत्तर प्रदेश में हिंदुत्व की राजनीति का सबसे बड़ा और मजबूत चेहरा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं। राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, श्रीकृष्ण जन्मभूमि और गौ संरक्षण जैसे मुद्दों पर बीजेपी का संगठन बेहद आक्रामक और मजबूत स्थिति में है।
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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अखिलेश यादव बीजेपी के इस सबसे मजबूत किले में सेंध लगा पाएंगे। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति में एक बड़ा जोखिम ये भी है कि अगर पारंपरिक पीडीए समर्थकों को ये लगा कि पार्टी अपने मूल सिद्धांतों से भटक रही है, तो उनके भीतर भ्रम और असंतोष की स्थिति पैदा हो सकती है। ये देखना दिलचस्प होगा कि ये दांव सपा को सत्ता तक पहुंचाता है या फिर कोई नया राजनीतिक संकट खड़ा करता है।

