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E20 पर क्यों मचा है बवाल, जानें जब पेट्रोल नहीं था तब किससे चलते थे वाहन

इन दिनों देश भर के वाहन मालिकों और आम जनता के बीच इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल (Ethanol-Blended Petrol) को लेकर भारी बहस और हंगामा देखने को मिल रहा है। वर्तमान में लगभग सभी पेट्रोल पंपों पर यह मिश्रित ईंधन आसानी से मिल रहा है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में कार और बाइक मालिक इस नए ईंधन को लेकर अपनी गहरी नाराजगी और चिंता जाहिर कर रहे हैं।

कई वाहन विशेषज्ञों और चालकों का दावा है कि इस ईंधन के लगातार इस्तेमाल से गाड़ियों के महंगे इंजन समय से पहले खराब हो सकते हैं। लेकिन क्या आप इस दिलचस्प ऐतिहासिक तथ्य से वाकिफ हैं कि दुनिया में पेट्रोल की खोज होने से बहुत पहले गाड़ियां किस ईंधन से दौड़ती थीं?

आपको यह जानकर बेहद हैरानी होगी कि वह ईंधन कोई और नहीं, बल्कि यही ‘इथेनॉल’ था! तो फिर आज के इस आधुनिक दौर में इसे लेकर इतना बड़ा विवाद क्यों खड़ा हो गया है? आइए इसके पीछे की पूरी इनसाइड स्टोरी को विस्तार से समझते हैं।

जब इथेनॉल ही था गाड़ियों का ‘राजा’, जानिए इसका शानदार इतिहास

ऑटोमोबाइल के शुरुआती इतिहास पर नजर डालें तो जब दुनिया में पहली बार गाड़ियां बनाई और डिजाइन की गई थीं, तब इथेनॉल ही सबसे लोकप्रिय और प्राथमिक ईंधन हुआ करता था। हालांकि, 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में जब वैज्ञानिकों ने मिनरल ऑयल यानी क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) के विशाल भंडारों की खोज की, तो पूरी वैश्विक स्थिति ही पलट गई।

जमीन से क्रूड ऑयल निकालना और उसे पेट्रोल-डीजल में रिफाइन करना, फसलों से इथेनॉल बनाने की तुलना में कहीं ज्यादा सस्ता और आसान साबित हुआ। इसी दौरान बड़ी तेल कंपनियों की तगड़ी लॉबिंग और अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों द्वारा इथेनॉल पर भारी टैक्स (कर) लगा देने की वजह से यह पर्यावरण-अनुकूल ईंधन धीरे-धीरे चलन से पूरी तरह बाहर हो गया, और पूरी दुनिया पूरी तरह से पेट्रोल और डीजल पर निर्भर हो गई।

सिर्फ भारत नहीं; ब्राजील, अमेरिका और जापान में भी इथेनॉल का जलवा

आज के दौर में दुनिया भर की सरकारें ग्लोबल वार्मिंग, खतरनाक कार्बन उत्सर्जन और वायु प्रदूषण को कम करने के लिए एक बार फिर से इथेनॉल का रुख कर रही हैं। यह बदलाव सिर्फ भारत में ही नहीं देखा जा रहा है, बल्कि ब्राजील, अमेरिका और जापान जैसे विकसित देश भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में ‘E10’ (10% इथेनॉल) और ‘E15’ (15% इथेनॉल) ईंधन का इस्तेमाल बेहद आम है।

वहीं, ब्राजील में तो ‘E27’ (27% इथेनॉल) को स्टैंडर्ड पेट्रोल माना जाता है, जबकि तकनीक के मामले में आगे रहने वाले जापान में भी गाड़ियों के लिए ‘E10’ पेट्रोल का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है।

आखिर क्यों हो रहा है इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल का तीखा विरोध?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफल होने के बाद भी भारत में इसका विरोध होने के पीछे दो मुख्य और बेहद तार्किक कारण हैं। पहला सबसे बड़ा कारण है पुरानी गाड़ियों के इंजन के खराब होने का डर।

दरअसल, इथेनॉल में हवा से नमी (Water Moisture) को सोखने का एक प्राकृतिक गुण होता है। जब यह ईंधन लंबे समय तक टैंक में रहता है, तो पुरानी गाड़ियों के इंजन के अंदरूनी हिस्सों में जंग (Rusting) लगने का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। इसके अलावा, इथेनॉल के रासायनिक प्रभाव से गाड़ियों के फ्यूल पाइप और रबर के नाजुक पार्ट्स भी गलकर खराब हो सकते हैं।

आम आदमी की जेब पर सीधा वार: 3 से 5 फीसदी तक घट रहा है माइलेज

विरोध की दूसरी और सबसे बड़ी वजह है गाड़ियों के माइलेज (Fuel Efficiency) में आने वाली भारी कमी। तकनीकी रूप से शुद्ध पेट्रोल की तुलना में इथेनॉल की एनर्जी डेंसिटी (ऊर्जा घनत्व) काफी कम होती है।

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इसका सीधा परिणाम यह होता है कि जब आप गाड़ी में इथेनॉल-मिश्रित पेट्रोल डलवाते हैं, तो गाड़ी का माइलेज लगभग 3 से 5 प्रतिशत तक कम हो जाता है। यानी कम दूरी तय करने के लिए भी गाड़ी को ज्यादा ईंधन की खपत करनी पड़ती है, जिसका सीधा और सीधा असर देश के आम आदमी की जेब और मासिक बजट पर पड़ रहा है। यही वजह है कि पर्यावरण के अनुकूल होने के बावजूद लोग इसे अपनाने में कतरा रहे हैं।

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