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सावधान! पेट्रोल पंप पर जाने से पहले ये रिपोर्ट देख लें, कहीं भारी न पड़ जाए ‘E20’ का फॉर्मूला

गाड़ियों में रफ्तार भरने वाले शुद्ध पेट्रोल का अस्तित्व क्या भारत में सचमुच खत्म होने वाला है? क्या अब हमारी गाड़ियां सिर्फ पेट्रोल और इथेनॉल के मिश्रण से ही सड़कों पर दौड़ेंगी? क्या देश भर के हर पेट्रोल पंप पर अब सिर्फ ‘ई20’ (E20) फॉर्मूले वाला ही ईंधन मिलेगा? और सबसे बड़ा डर—क्या इसके इस्तेमाल से हमारी गाड़ियां सच में समय से पहले कबाड़ हो जाएंगी? क्या सरकार सिर्फ बड़े व्यापारियों को फायदा पहुंचाने के लिए यह कदम उठा रही है, और इस मुद्दे पर विपक्ष जो दावे कर रहा है, क्या वे शत-प्रतिशत सही हैं?

जरा रुकिए। इस विशेष रिपोर्ट को तैयार करते वक्त ठीक यही सारे सवाल हमारे जेहन में भी कौंध रहे थे, जो इस वक्त आपके दिमाग में चल रहे हैं। हर कोई जानना चाहता है कि आखिर ये पूरा माजरा क्या है? तो चलिए, बिना किसी लाग-लपेट के आपको बहुत ही आसान शब्दों में समझाते हैं कि E20 पेट्रोल के इस्तेमाल से आम जनता का नुकसान होने वाला है या फिर कोई ऐसा बड़ा फायदा छिपा है जो शायद अभी आप देख नहीं पा रहे हैं।

2030 का टारगेट 2025 में ही पूरा, जानिए क्या है E20 का गणित

दरअसल, भारत सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम के तहत पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने का एक बड़ा लक्ष्य तय किया था। पहले इस टारगेट को हासिल करने की समय सीमा साल 2030 रखी गई थी, मगर सरकार और तेल कंपनियों की तत्परता के चलते इसे समय से काफी पहले यानी साल 2025-26 में ही देशव्यापी स्तर पर पूरा कर लिया गया। यही वजह है कि आज देश के लगभग सभी प्रमुख पेट्रोल पंपों पर E20 ईंधन (80% पेट्रोल + 20% इथेनॉल) ही डिस्पेंस किया जा रहा है।

कार और पूरी ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का दावा है कि E20 ईंधन पूरी तरह सुरक्षित है। परीक्षणों में सामने आया है कि इससे माइलेज में होने वाला नुकसान बेहद मामूली (लगभग 3 से 5 प्रतिशत) है, और फ्लेक्स-फ्यूल फ्रेंडली नई गाड़ियों में इससे कोई तकनीकी समस्या नहीं आती।

फिर सोशल मीडिया पर क्यों मचा है बवाल, क्या वाकई खराब हो रही हैं गाड़ियां?

भारत में यह एक बेहद आम बात है कि जब भी कोई नई तकनीक या नीति बाजार में आती है, तो लोग उस पर आजमाने से पहले ही अपनी राय बना लेते हैं। E20 पेट्रोल को लेकर भी सोशल मीडिया पर जमकर अफवाहें और डर का माहौल बनाया जा रहा है। हालांकि, जमीनी हकीकत देखें तो कुछ जगहों पर उपभोक्ताओं को व्यावहारिक दिक्कतें जरूर महसूस हुई हैं। कुछ पुरानी गाड़ियों के मालिकों ने शिकायत की है कि इस तेल के इस्तेमाल से उनकी गाड़ी का माइलेज अचानक कम हो गया है और कुछ मामलों में इंजन के पुर्जों में खराबी दर्ज की गई है।

इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए देश के परिवहन मंत्री ने सार्वजनिक रूप से साफ कहा है कि जिन भी वाहन स्वामियों को अपनी गाड़ियों के माइलेज या इंजन में E20 की वजह से कोई भी समस्या आ रही है, वे तुरंत अपनी गाड़ी को संबंधित कंपनी के अधिकृत सर्विस सेंटर पर ले जा सकते हैं। सरकार और ऑटो कंपनियां मिलकर तकनीकी रूप से उन कमियों को दूर करके देंगी।

आखिर सरकार E20 पेट्रोल पर इतना जोर क्यों दे रही है?

अब सवाल उठता है कि जब जनता में इसे लेकर थोड़ी सी हिचकिचाहट है, तो सरकार इस नीति पर इतनी आक्रामक क्यों है? इसका सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा से है-

  • कच्चे तेल के भारी बिल से आजादी: भारत अपनी जरूरत का एक बहुत बड़ा हिस्सा (लगभग 80-85%) कच्चे तेल के रूप में विदेशों से आयात करता है। इससे देश के खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ता है।
  • विदेशी मुद्रा की भारी बचत: पेट्रोल में 20% इथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल का आयात सीधे तौर पर कम हो जाएगा, जिससे देश के अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचेगी।
  • पर्यावरण संरक्षण: इथेनॉल एक स्वच्छ और पर्यावरण-अनुकूल ईंधन है। पेट्रोल में इसके मिश्रण से गाड़ियों से होने वाला खतरनाक कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) काफी हद तक घट जाता है।
  • आत्मनिर्भर भारत: यह कदम भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक पहल है।

किसानों की बढ़ेगी आमदनी और देश में आएगा बंपर निवेश

इथेनॉल मूल रूप से एक अल्कोहल आधारित जैविक ईंधन (Biofuel) है, जिसे गन्ने के रस, मक्का, टूटे चावल और अन्य अधिशेष कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। जब देश में इथेनॉल की मांग बढ़ेगी, तो सीधे तौर पर बाजार में गन्ना और मक्का की डिमांड में भारी उछाल आएगा। इसका सीधा और सबसे बड़ा फायदा देश के अन्नदाता यानी किसानों को होगा, जिन्हें अपनी फसलों के बेहतरीन दाम मिलेंगे।

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इसके साथ ही, देश में इथेनॉल डिस्टिलरी और नई फैक्ट्रियों की स्थापना के लिए बड़े पैमाने पर निवेश बढ़ रहा है। सार्वजनिक और निजी बैंकों ने इस सेक्टर में भारी निवेश को फंड किया है, जिससे ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा हो रहे हैं। वैकल्पिक ईंधन की यह व्यवस्था भारत के औद्योगिक भविष्य को एक नई मजबूती दे रही है।

पुरानी गाड़ियों की देखरेख है जरूरी, विपक्ष की ‘राजनीतिक गोटियां’

ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का कहना है कि लोगों की गाड़ियों में दिक्कत आने की एकमात्र वजह यह है कि उनकी गाड़ियां काफी पुरानी तकनीक (BS-IV या उससे पहले की) पर आधारित हैं। सरकार की तरफ से भी यह साफ किया गया है कि यदि पुरानी गाड़ियों के मालिक अपने फ्यूल टैंक और इंजन की समय पर सही तरीके से ट्यूनिंग और देखरेख (Maintenance) कराएंगे, तो यह समस्या काफी हद तक खत्म हो जाएगी। जहां तक साल 2023 के बाद बनी नई गाड़ियों (BS-VI फेज-2) का सवाल है, उनमें कंपनियां पहले से ही E20 कंप्लायंट इंजन दे रही हैं, इसलिए उनमें खराबी का कोई सवाल ही नहीं उठता।

मगर आम जनता को होने वाली इसी शुरुआती और तकनीकी परेशानी को एक बड़ा मुद्दा बनाकर विपक्ष अब सरकार को घेरने और अपनी राजनीतिक गोटियां सेट करने में जुट गया है।

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