नेपाल में जल प्रलय या ‘वाटर बम’ की साजिश, 800 से अधिक मौतों के बाद चीन की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
नेपाल में आई हालिया विनाशकारी जल प्रलय ने पूरे हिमालयी क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया है। तिब्बत के ऊपरी इलाके से लगभग आधा किलोमीटर लंबा ग्लेशियर टूटकर 4,000 फीट नीचे गिरने से आई भीषण बाढ़ में अब तक 800 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है, जबकि करीब 2,500 नागरिक लापता हैं।
इस मानवीय त्रासदी के बीच अब यह बहस छिड़ गई है कि क्या यह महज एक प्राकृतिक आपदा थी या इसके पीछे कोई सोची-समझी साजिश और घोर लापरवाही छिपी है।
पूर्व ‘रॉ’ अधिकारी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने बीजिंग पर दागे सवाल
भारत की खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (R&AW) के पूर्व अधिकारी लकी बिष्ट ने सोशल मीडिया पर इस त्रासदी को लेकर चीन के रवैये पर कड़े सवाल उठाए हैं। वहीं नेपाल के स्थानीय पत्रकारों और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने भी बीजिंग की चुप्पी पर हैरानी जताई है। आलोचकों का कहना है कि तिब्बत क्षेत्र में अत्याधुनिक तकनीक और सर्विलांस सिस्टम होने के बावजूद चीन ने समय रहते नेपाल को खतरे की पूर्व चेतावनी (Early Warning) क्यों नहीं जारी की।
आधुनिक तकनीक होने के बावजूद क्यों नहीं जारी हुआ अलर्ट?
तिब्बत का निगरानी बुनियादी ढांचा पूरी तरह चीन के नियंत्रण में है। इससे पहले चीन का अर्ली वॉर्निंग सिस्टम करीब सात बार समय रहते चेतावनी जारी कर चुका है, जिसमें पिछले साल की एक सीमा-पार चेतावनी भी शामिल थी। इसके बावजूद, इस बार इतना बड़ा ग्लेशियर टूटने और नीचे भारी मात्रा में पानी व मलबा बहने से पहले नेपाल को कोई डेटा या संकेत नहीं दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कुछ घंटे पहले भी अलर्ट मिल जाता, तो सैकड़ों निर्दोष लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
उत्तराखंड आपदा और वेदर मॉडिफिकेशन तकनीक की चर्चा
इस त्रासदी के बाद 13 साल पहले उत्तराखंड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा की यादें भी ताजा हो गई हैं। उस समय भी कुछ भारतीय राजनेताओं ने हिमालयी क्षेत्र में असामान्य मौसमी घटनाओं और चीन की वेदर मॉडिफिकेशन (बादलों से छेड़छाड़/क्लाउड सीडिंग) तकनीकों को लेकर उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई थी। चीन के पास ऐसी तकनीकें उपलब्ध हैं, जिससे कृत्रिम बारिश और मौसमी बदलाव किए जा सकते हैं, जिससे इन संदेहों को और बल मिल रहा है।
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हिमालयी क्षेत्र में बढ़ता ग्लेशियल झीलों का खतरा
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे नई ग्लेशियल झीलों का निर्माण हो रहा है और पुरानी झीलों का जलस्तर खतरनाक स्तर पर पहुंच रहा है। भूकंप या भारी जल-दबाव के कारण जब ये झीलें फटती हैं (GLOF), तो लाखों क्यूसेक पानी और मलबा चंद मिनटों में घाटियों में तबाही मचा देता है। इस बढ़ते खतरे को देखते हुए दोनों देशों के बीच समय पर हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना और सीमा-पार आपदा समन्वय बेहद अनिवार्य हो गया है।

