जयंत चौधरी के गढ़ में अखिलेश यादव का बड़ा प्लान! 2027 से पहले बदल सकता है पश्चिमी यूपी का समीकरण
उत्तर प्रदेश की सियासत में इन दिनों पश्चिमी यूपी का इलाका सबसे बड़ा अखाड़ा बन चुका है। राष्ट्रीय लोकदल (RLD) के मुखिया जयंत चौधरी जहां एनडीए के साथ मिलकर अपनी स्थिति मजबूत करने में जुटे हैं।
वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए पश्चिमी यूपी की बिसात पर नए मोहरे सेट कर रहे हैं। ‘चवन्नी’ वाले बयान से भड़की जुबानी जंग अब पोस्टर और बयानों से निकलकर सीधे सांगठनिक खींचतान तक पहुंच चुकी है। लखनऊ से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में इस बात की तेज चर्चा है कि क्या अखिलेश यादव वेस्ट यूपी में जयंत चौधरी के मजबूत सियासी किले में बड़ी सेंधमारी की तैयारी कर चुके हैं।
चवन्नी वाले बयान से शुरू हुआ टकराव अब बना सियासी वर्चस्व की जंग
सपा मुखिया अखिलेश यादव ने हाल ही में तंज कसते हुए कहा था कि जिसे कभी चवन्नी से रुपया बनाया, वही साथ छोड़कर चले गए। इस पर जयंत चौधरी ने भी पलटवार करते हुए इसे स्वाभिमान और जाट समाज की प्रतिष्ठा से जोड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल दो नेताओं के बीच की बयानबाजी नहीं है, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के उस वोट बैंक पर नियंत्रण की लड़ाई है जो किसी भी दल की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाता है। गठबंधन टूटने के बाद से ही दोनों दलों के बीच एक-दूसरे के जनाधार को कमजोर करने की रणनीति पर लगातार काम चल रहा है।
भाजपा-रालोद गठबंधन के बाद नेताओं में असमंजस और सपा की नजर
भाजपा के साथ रालोद के जाने के बाद पार्टी के भीतर कुछ स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति दिख रही है। गठबंधन की राजनीति में टिकटों का दायरा सीमित हो जाता है, जिससे कई महत्वाकांक्षी नेताओं को अपने राजनीतिक रास्ते बंद होते नजर आ रहे हैं। इसी असंतोष को भांपते हुए समाजवादी पार्टी सक्रिय हो गई है। अखिलेश यादव पश्चिमी यूपी में पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के साथ-साथ नाराज क्षेत्रीय चेहरों को अपने पाले में लाने के लिए लगातार रणनीतिक बैठकें कर रहे हैं।
सहारनपुर में 3 सितंबर की रैली से पहले गरमाया माहौल
सहारनपुर में 3 सितंबर को प्रस्तावित जयंत चौधरी की बड़ी रैली से पहले जमीनी स्तर पर हलचल काफी बढ़ गई है। चर्चा है कि कुछ स्थानीय पदाधिकारी और प्रभावशाली नेता आयोजन की तैयारियों में पहले जैसा उत्साह नहीं दिखा रहे हैं। हाल के दिनों में कुछ स्थानीय चेहरों द्वारा पार्टी गतिविधियों से बनाई गई दूरी ने रालोद नेतृत्व की चिंता बढ़ा दी है। सपा इस स्थिति पर बारीक नजर बनाए हुए है ताकि सही समय पर प्रभावी नेताओं को अपने साथ जोड़कर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया जा सके।
योगी की मातृशक्ति योजनाएं या डिंपल की ‘स्त्री सम्मान’ योजना, महिलाओं के बीच किसकी पकड़ मजबूत
2027 की चुनावी बिसात पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश का नया समीकरण
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 2027 की जंग केवल सपा और भाजपा के बीच सीधी लड़ाई नहीं होगी, बल्कि रालोद की पकड़ और सपा की आक्रामकता इसके परिणाम तय करेगी। अखिलेश यादव का पूरा फोकस मुस्लिम, दलित, पिछड़े और जाट समुदाय के असंतुष्ट तबके को एक साझा मंच पर लाने का है। दूसरी ओर, जयंत चौधरी अपने संगठन, रैलियों और एनडीए की ताकत के जरिए अपने पारंपरिक गढ़ को अभेद्य बनाए रखने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव रालोद के जमीनी ढांचे में दरार पैदा कर पाते हैं या फिर जयंत चौधरी अपनी संगठनात्मक मजबूती से इन अटकलों पर विराम लगाते हैं।

