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राजीव गांधी और आज की Gen Z : 18 से आज तक की आवाज़ तक

आज की Gen Z को केवल एक नई पीढ़ी कह देना उसके जज़्बे को छोटा करना होगा। यह वह पीढ़ी है जो सवाल पूछती है, असहमति दर्ज करती है, अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है और सत्ता से जवाब मांगने में संकोच नहीं करती। खासकर युवा लड़कियों की बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी ने यह दिखाया है कि लोकतंत्र अब केवल संसद और राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं है—वह कैंपस, सड़क, सोशल मीडिया और नागरिक समाज में भी जीवंत है।

आज जब हम युवाओं के इस आत्मविश्वास और विरोध की ऊर्जा को देखते हैं, तो 1980 के दशक का एक महत्वपूर्ण संवैधानिक निर्णय याद आता है। उस वक्त राजीव गांधी के कार्यकाल में 61वें संविधान संशोधन के माध्यम से मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई।

यह केवल मतदान की उम्र कम करने का फैसला नहीं था। इसके पीछे एक गहरी लोकतांत्रिक सोच थी—जिस युवा से देश अपने भविष्य की उम्मीद करता है, उसे देश के वर्तमान के फैसलों में भी भागीदारी मिलनी चाहिए।

उस समय 18 वर्ष की उम्र में मतदान का अधिकार देना आज की Gen Z को देखते हुए और भी दूरदर्शी दिखाई देता है। उस दौर में न Instagram था, न Twitter/X, न smartphones और न ही आज जैसा digital public sphere। फिर भी युवा भारत की राजनीतिक क्षमता को पहचानते हुए लोकतंत्र में उनकी भागीदारी का दायरा बढ़ाया गया।

युवा केवल भविष्य नहीं, वर्तमान हैं। आज की Gen Z किसी मुद्दे पर केवल सहमति या असहमति व्यक्त नहीं करती; वह सवाल करती है—

  • क्यों?
  • किसके लिए?
  • किसके अधिकार की कीमत पर?
  • और जवाबदेही किसकी है?
  • यही प्रश्न लोकतंत्र की असली ऊर्जा हैं।

आज की युवा लड़कियाँ विशेष रूप से इस बदलाव की प्रतीक हैं। वे शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, समानता, प्रतिनिधित्व और अपने अधिकारों को लेकर मुखर हैं। वे यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं कि उनकी आवाज़ केवल इसलिए कम महत्वपूर्ण है क्योंकि वे युवा हैं या महिलाएँ हैं।

यह परिवर्तन अचानक नहीं आया। भारतीय लोकतंत्र ने धीरे-धीरे युवाओं और महिलाओं की राजनीतिक गतिविधियों को स्वीकार किया है। 18 वर्ष की मतदान आयु उस यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी।

राजीव गांधी की सोच और आज की Gen Z

राजीव गांधी की राजनीति में युवा, शिक्षा, विज्ञान और आधुनिकता महत्वपूर्ण विषय थे। उनके दौर में मतदान की आयु घटाने का निर्णय इसी व्यापक युवा-केंद्रित दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है।

आज Gen Z जिस डिजिटल दुनिया में पैदा हुई है, उसमें सूचना की गति बहुत तेज है। लेकिन लोकतंत्र की मूल शक्ति आज भी वही है-सवाल पूछना, विचार रखना, असहमति व्यक्त करना और अपने मत का इस्तेमाल करना।

यही वह जगह है जहाँ 1988 का संवैधानिक बदलाव और 2026 की Gen Z एक-दूसरे से जुड़ते दिखाई देते हैं।

तब संदेश था:

“18 साल का युवा लोकतंत्र में निर्णय लेने के योग्य है।”

आज की Gen Z कह रही है:

“अगर हम निर्णय लेने के योग्य हैं, तो हमारी आवाज़ सुनने के योग्य भी समझे जाएँ।”

लड़कियों की आवाज़—लोकतंत्र की नई शक्ति

आज के युवा आंदोलनों में लड़कियों की सक्रिय भागीदारी भारतीय लोकतंत्र के बदलते स्वरूप का महत्वपूर्ण संकेत है।

यह केवल gender representation का सवाल नहीं है। यह उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत है जिसमें युवा महिलाएँ अपने लिए निर्णय लेने वाली राजनीतिक व्यवस्था के रूप में सामने आ रही हैं।

वे केवल किसी आंदोलन की भागीदारी नहीं हैं; वे agenda-setter, organiser, speaker और leader भी हैं।

यही वह भारत है जिसकी कल्पना शिक्षा, लोकतांत्रिक अधिकार और समान अवसरों के विस्तार से की जा सकती थी।

Protest का अर्थ क्या है?

लोकतंत्र में protest लोकतंत्र का विरोध नहीं है। यह सत्ता में बैठे हुए लोकतंत्र के रखवाले को याद रखना चाहिए।

लोकतांत्रिक प्रोटेस्ट स्वयं लोकतंत्र की एक भाषा है—बशर्ते वह शांतिपूर्ण, संवैधानिक और दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने वाला हो।

आज Gen Z का प्रोटेस्ट हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल हर पाँच साल में वोट देने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है—
Vote + Voice + Question + Accountability + Participation.

और 18 वर्ष की मतदान आयु ने इस लोकतांत्रिक भागीदारी का दरवाज़ा पहले ही व्यापक कर दिया था।

JNU जैसे विश्वविद्यालय में इस विचार का महत्व और बढ़ जाता है। यहाँ छात्र केवल degree हासिल करने नहीं आते; वे समाज, राजनीति, दर्शन, अर्थव्यवस्था और भारत के भविष्य पर विचार करते हैं। इसलिए JNU की युवा राजनीति को केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा तक सीमित करना उस ऊर्जा को छोटा करना होगा।

विश्विद्यालयों की Gen Z को Rajiv Gandhi के उस युवा-विश्वास को एक नए युग में बदलना होगा—

Vote से Voice तक,
Voice से Ideas तक,
Ideas से Research तक,
Research से Policy तक,
और Policy से Nation Building तक।

राजीव गांधी के दौर में 21 से 18 वर्ष की मतदान आयु करना आज की दृष्टि से इसलिए महत्वपूर्ण लगता है क्योंकि उसने भारतीय लोकतंत्र को यह संदेश दिया कि युवा नागरिकों पर भरोसा किया जाना चाहिए।

आज की Gen Z उस भरोसे को केवल वोट डालकर नहीं, बल्कि सवाल पूछकर, शांतिपूर्ण विरोध करके, शोध करके, नेतृत्व करके और लोकतांत्रिक संस्थाओं में भाग लेकर आगे बढ़ा सकती है और आज की युवा लड़कियों की आवाज़ इस बदलाव का सबसे जीवंत प्रतीक है।

तब 18 साल की उम्र में लोकतंत्र ने युवा को वोट दिया था।
आज वही युवा लोकतंत्र से अपनी आवाज़ की जगह मांग रहा है।

यही लोकतंत्र की खूबसूरती है—

“पीढ़ियाँ बदलती हैं, सवाल बदलते हैं, तकनीक बदलती है; लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत हमेशा जागरूक युवा नागरिक ही होते हैं।”

राजीव गांधी ने युवा को वोट की ताकत दी थी।
अब Gen Z को उस वोट को विचार, आवाज़ और बदलाव की ताकत में बदलना है।

नवीन कुमार
शोधार्थी छात्र, जेएनयू
दर्शन शास्त्र विभाग

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