कश्मीर पर पाकिस्तान का प्रोपेगैंडा पूरी तरह ध्वस्त, भारत और अमेरिका ने मिलकर दिया झटका
सऊदी अरब और तुर्की के साथ हुए बड़े त्रिपक्षीय रक्षा व सैन्य समझौते के बाद पाकिस्तान अभी अपनी रणनीतिक कामयाबी का जश्न भी ठीक से नहीं मना पाया था कि उसे एक साथ दो बड़े कूटनीतिक झटकों का सामना करना पड़ा है। पाकिस्तान के लिए रक्षा समझौते से मिली खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी और उसे एक झटका नई दिल्ली से तो दूसरा वाशिंगटन से मिला है।
नई दिल्ली का ‘जैसे को तैसा’ रुख: इस्लामाबाद की हरकत का तुरंत जवाब
पहलगाम आतंकी हमले के बाद से दोनों देशों के बीच तल्खी लगातार बढ़ती जा रही है। हाल ही में इस्लामाबाद में भारतीय उच्चायोग के बाहर से पार्किंग पोल हटाए जाने की प्रशासनिक कार्रवाई सामने आई थी। नई दिल्ली ने इस कदम का जवाब देने में जरा भी देरी नहीं की।
भारत ने पलटवार करते हुए नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग के बाहर लगे ट्रैफिक बोलार्ड्स और बैरिकेड्स हटा दिए। भारत-पाकिस्तान के कूटनीतिक इतिहास में कर्मचारियों की संख्या घटाने, आवागमन सीमित करने और प्रशासनिक बंदिशें लगाने जैसी जवाबी कार्रवाइयां पहले भी देखी जाती रही हैं, जहां भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी एकतरफा कदम का तुरंत और वैसा ही जवाब मिलेगा।
अमेरिकी राजदूत का जम्मू-कश्मीर दौरा: बदलती कूटनीति के संकेत
पाकिस्तान के लिए दूसरा और कहीं अधिक गंभीर झटका अमेरिका की ओर से आया है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में जम्मू-कश्मीर का दौरा किया और वहां के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से बेहद गर्मजोशी भरी मुलाकात की। इस दौरे के दौरान सर्जियो गोर ने जम्मू-कश्मीर को भारत का बेहद खूबसूरत और अहम हिस्सा बताया। अमेरिकी राजदूत का यह बयान और उनकी घाटी यात्रा अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर के बदलते सुरक्षा हालात और स्थिरता की वैश्विक स्वीकृति का स्पष्ट संकेत देती है।
इस्लामाबाद की कूटनीतिक बेचैनी और घरेलू दबाव
सर्जियो गोर के इस बयान पर पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में अमेरिकी राजनयिक को तलब कर कड़ा विरोध दर्ज कराया है। कूटनीतिक जानकारों का विश्लेषण है कि जब अमेरिका जैसा महाशक्तिशाली देश कश्मीर विवाद का जिक्र किए बिना जम्मू-कश्मीर को भारत का महत्वपूर्ण हिस्सा बताता है, तो यह पाकिस्तान के उस पुराने नैरेटिव को सीधी चोट पहुंचाता है जिसके जरिए वह इसे लगातार एक अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में पेश करने की कोशिश करता रहा है।
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यह घटनाक्रम भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक और नैरेटिव जीत माना जा रहा है, क्योंकि इस पूरे दौरे के दौरान मध्यस्थता की पुरानी चर्चाओं को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। पहले से ही पीओके और बलूचिस्तान के आंतरिक संकटों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए यह अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम घरेलू मोर्चे पर भी नई राजनीतिक और रणनीतिक चुनौतियां खड़ी कर रहा है।

