फर्श से अर्श तक या एक और झटका, बसपा के नए चक्रव्यूह में कौन फंसेगा- सपा, बीजेपी या कांग्रेस?
उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर रोमांचक मोड़ पर है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत करने के लिए आक्रामक रुख अख्तियार कर लिया है। खास बात यह है कि इस बार बसपा के निशाने पर सिर्फ सत्ताधारी बीजेपी ही नहीं, बल्कि विपक्षी दल समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस भी बराबर के दायरे में हैं। सहारनपुर में हुई एक विशाल रैली में आकाश आनंद के बयानों ने यूपी के सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
सहारनपुर रैली: आकाश आनंद ने सपा को बताया ‘बी-टीम’
सहारनपुर की रैली में आकाश आनंद ने बिना किसी लाग-लपेट के सभी बड़े दलों पर निशाना साधा। उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पर सीधा हमला बोलते हुए उन्हें बीजेपी की ‘बी-टीम’ तक करार दे दिया। इसके साथ ही सपा के बहुचर्चित PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले की प्रामाणिकता पर भी गंभीर सवाल खड़े किए।
कांग्रेस पार्टी पर भी कड़ा प्रहार करते हुए उन्होंने कहा कि चुनाव के वक्त संविधान और बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर की बात करने वाली कांग्रेस का दलितों के वास्तविक विकास और उत्पीड़न के मामलों में रिकॉर्ड निराशाजनक रहा है। वहीं, बीजेपी सरकार से युवाओं के लिए रोजगार, बेहतर शिक्षा, महंगाई और कानून व्यवस्था पर कड़ा हिसाब मांगा गया। रैली के दौरान नकुड़ सीट से नरेश सैनी को प्रत्याशी घोषित करके बसपा ने यह साफ कर दिया है कि पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए कमर कस ली है।
2007 से 2024 का सफर: क्या है बसपा की चुनौती?
बसपा की इस नई आक्रामक रणनीति के पीछे पार्टी का हालिया चुनावी इतिहास एक बड़ा कारण है। कभी साल 2007 में अपने दम पर उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने वाली बसपा का ग्राफ पिछले कुछ चुनावों में तेजी से गिरा है।
2022 का विधानसभा चुनाव: पार्टी सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई और इसका वोट शेयर घटकर करीब 12.9% रह गया।
2024 का लोकसभा चुनाव: पार्टी उत्तर प्रदेश में एक भी लोकसभा सीट जीतने में कामयाब नहीं हो पाई।
इन आंकड़ों ने बसपा के रणनीतिकारों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती न सिर्फ चुनाव जीतना है, बल्कि अपने उस पारंपरिक जाटव और दलित वोट बैंक को वापस साधना है, जो पिछले कुछ चुनावों में छिटककर अन्य दलों के पाले में चला गया था।
PDA बनाम बहुजन राजनीति: 2027 का सबसे बड़ा सियासी टकराव
आने वाले 2027 के विधानसभा चुनावों में बसपा और समाजवादी पार्टी के बीच सबसे बड़ा वैचारिक और राजनीतिक टकराव ‘PDA’ के मुद्दे पर होने की पूरी उम्मीद है।
सपा का दावा है कि PDA फॉर्मूले के जरिए वह समाज के सभी वंचित और शोषित वर्गों को एक साझा राजनीतिक मंच दे रही है। इसके विपरीत, आकाश आनंद लगातार यह सवाल उठा रहे हैं कि इस फॉर्मूले में दलितों और पिछड़ों को सत्ता और संगठन में असल हिस्सेदारी कितनी मिल रही है। बसपा का यह संदेश साफ है कि दलित राजनीति की असली और स्वाभाविक दावेदार केवल मायावती के नेतृत्व वाली बसपा ही है।
किसके समीकरण बिगड़ेंगे और किसे होगा फायदा?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि बसपा अपनी खोई हुई जमीन और पारंपरिक वोट बैंक को वापस जोड़ने में सफल होती है, तो इसका असर सभी प्रमुख दलों पर पड़ेगा।
समाजवादी पार्टी पर प्रभाव: दलित वोटों का झुकाव अगर फिर से बसपा की तरफ हुआ, तो सपा के PDA समीकरण को सीधे तौर पर झटका लग सकता है।
बीजेपी पर प्रभाव: जिन सीटों पर गैर-जाटव दलित मतदाताओं का समर्थन बीजेपी को मिलता रहा है, वहां बसपा की सक्रियता से सत्ताधारी दल की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
कांग्रेस पर प्रभाव: विपक्षी गठबंधन के भीतर दलित मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कांग्रेस की कोशिशों को भी बसपा की यह रणनीति कड़ी टक्कर देगी।
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संगठन की मजबूती और भविष्य की राह
सिर्फ रैलियों और भाषणों से सियासत नहीं बदलती, यह बात बसपा नेतृत्व अच्छी तरह जानता है। पार्टी सुप्रीमो मायावती के समर्थन के बाद अब आकाश आनंद को दो मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा। पहला मोर्चा है मायावती के पुराने और भरोसेमंद कैडर को एकजुट रखना और दूसरा मोर्चा है युवा पीढ़ी को रोजगार, शिक्षा और सामाजिक सम्मान के एजेंडे के साथ जोड़ना।
क्या बसपा का यह नया तेवर उत्तर प्रदेश की राजनीति में गेमचेंजर साबित होगा? क्या आकाश आनंद पार्टी को दोबारा फर्श से अर्श तक पहुंचा पाएंगे? इसका जवाब तो आने वाला वक्त और 2027 के चुनावी नतीजे ही देंगे, लेकिन इतना तय है कि यूपी की पिच पर मुकाबला अब बेहद दिलचस्प हो गया है।

