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नीतीश ने ली शपथ, लेकिन टेंशन में हैं अखिलेश; ओवैसी का ये प्लान डाल देगा खेल में पलीता

बिहार में नई सरकार के गठन के बाद राजनीतिक गलियारों में उत्साह है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एनडीए की शानदार जीत के साथ शपथ ली। लेकिन इस चुनावी नतीजे का असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी इसकी गूंज सुनाई दे रही है। खासकर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के प्रदर्शन ने समाजवादी पार्टी सपा के मुखिया अखिलेश यादव की चिंता बढ़ा दी है।

सीमांचल में ओवैसी का जलवा: मुस्लिम वोटों का नया समीकरण

बिहार के सीमांचल इलाके में एआईएमआईएम ने पाँच सीटें जीतकर सबको चौंका दिया। यह पार्टी मुस्लिम विधायकों वाली सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है। आरजेडी राष्ट्रीय जनता दल को सिर्फ 25 सीटें मिलीं जिसकी एक बड़ी वजह मुस्लिम वोट बैंक में हुई सेंधमारी मानी जा रही है। राजनीतिक पंडितों का विश्लेषण कहता है कि आरजेडी का पारंपरिक एमवाई यानी मुस्लिम-यादव समीकरण दरक चुका है।

साल 2015 के मुकाबले एआईएमआईएम के वोट शेयर में लगभग दोगुना इजाफा हुआ है। पिछली बार जहाँ उसे 1.03% वोट मिले थे वहीं इस बार यह आंकड़ा 1.85% तक पहुँच गया। यह बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि मुस्लिम मतदाता अब विकल्प तलाश रहे हैं। जहाँ यादवों की संख्या कम है वहाँ मुस्लिम समुदाय को अब सेकुलर दलों को वोट देने की मजबूरी नजर नहीं आ रही है। उन्हें लगता है कि वे अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिता सकते हैं।

यूपी के लिए खतरे की घंटी: अखिलेश की चुनौती

बिहार के ये नतीजे सीधे तौर पर अखिलेश यादव के लिए अलर्ट हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिलों खासकर पश्चिमी यूपी के बड़े हिस्से में मुस्लिम आबादी अच्छी खासी है लेकिन सपा का आधार माने जाने वाले यादवों की संख्या कम है।

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इसके अलावा सपा के मुस्लिम वोट बैंक में नाराजगी की खबरें भी सामने आई हैं। आरोप है कि आजम खान के बचाव में अखिलेश यादव उतने मुखर नहीं रहे जितना समुदाय को उम्मीद थी। अगर यही नैरेटिव यानी कहानी आगे बढ़ती रही और ओवैसी ने 2027 के विधानसभा चुनाव में मजबूती से अपने उम्मीदवार उतारे तो अखिलेश की राह मुश्किल हो सकती है।

मुस्लिम राजनीति का नया चेहरा: सपा का कोर वोट बैंक निशाने पर

एआईएमआईएम लंबे समय से खुद को मुस्लिम समुदाय की एक प्रभावी आवाज के तौर पर स्थापित करने की कोशिश कर रही है। बिहार में उसने आरजेडी और कांग्रेस के पारंपरिक मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई। उत्तर प्रदेश में मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से सपा का मजबूत आधार रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एआईएमआईएम यूपी के पूर्वी और मध्य हिस्सों पर ध्यान केंद्रित करके सपा के इस कोर वोट बैंक में विभाजन पैदा कर सकती है। एआईएमआईएम को अक्सर वोट कटर पार्टी कहा जाता है क्योंकि यह मुख्य रूप से विपक्ष के वोटों को बाँटती है जिसका फायदा अप्रत्यक्ष रूप से बीजेपी को होता है।

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अगर ओवैसी की पार्टी 2027 में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराती है तो मुस्लिम बहुल सीटों पर सपा के उम्मीदवारों के लिए बड़ी सिरदर्दी खड़ी हो सकती है भले ही एआईएमआईएम खुद ज्यादा सीटें न जीत पाए। ओवैसी का नेतृत्व और उनकी आक्रामक राजनीति मुस्लिम युवाओं के एक वर्ग को आकर्षित कर सकती है जो सपा या बसपा जैसी पुरानी पार्टियों की धीमी रफ्तार वाली राजनीति से निराश हैं।

पश्चिमी यूपी और अवध का गणित

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई जिले जैसे गाजियाबाद नोएडा हापुड़ मेरठ मुजफ्फरनगर शामली बागपत सहारनपुर बिजनौर मुरादाबाद संभल और रामपुर में यादवों की आबादी बहुत निर्णायक नहीं है। इसके अलावा अवध के भी कुछ जिले ऐसे हैं जहाँ यादव अच्छी संख्या में हैं पर ठाकुर ब्राह्मण जैसे बीजेपी के वोटर समुदाय भी बड़ी आबादी में मौजूद हैं।

ऐसी स्थिति में अगर मुस्लिम मतदाताओं को यह एहसास हुआ कि वे सपा का साथ दिए बिना भी अपनी पसंद का उम्मीदवार कुछ सीटों पर जीता सकते हैं तो चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं। 2022 में ओवैसी को यूपी में 0.49% वोट मिले थे। अगर बिहार की तरह यह आंकड़ा 2% या उसके करीब पहुँचता है तो तस्वीर एकदम नई हो सकती है।

चूँकि बिहार का सीमांचल क्षेत्र यूपी से लगा हुआ है इसलिए एआईएमआईएम की जीत का संदेश पूर्वी उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल जिलों जैसे बलरामपुर सिद्धार्थ नगर गोरखपुर और यहाँ तक कि मध्य यूपी के कुछ हिस्सों तक भी आसानी से पहुँच सकता है। बिहार की सफलता से उत्साहित ओवैसी अब जाहिर तौर पर उत्तर प्रदेश जैसे अन्य राज्यों पर भी ध्यान केंद्रित करेंगे। आने वाले चुनाव में उनकी रणनीतियाँ क्या होंगी यह देखना दिलचस्प होगा।

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