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बिहार की जीत से UP में भूचाल, नीतीश के शपथ के बाद अखिलेश यादव को सता रहा है कौन सा डर

बिहार में नीतीश कुमार के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की नई सरकार बन चुकी है। शपथ ग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित कई बड़े नेता मौजूद थे। यह जीत एनडीए के लिए बड़ी कामयाबी है लेकिन इसका असर सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं है। पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश में भी इन नतीजों को लेकर खासी चर्चा है। खासतौर पर सीमांचल इलाके में हुए राजनीतिक उलटफेर ने यूपी के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।

ओवैसी की AIMIM बनी मुस्लिम राजनीति की नई धुरी

बिहार चुनाव में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने सीमांचल क्षेत्र में पाँच सीटें जीतकर सबको चौंका दिया है। इस जीत के साथ एआईएमआईएम मुस्लिम विधायकों वाली सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। यह ट्रेंड राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। आरजेडी सिर्फ पच्चीस सीटें ही जीत पाई।

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कई विश्लेषकों का मानना है कि आरजेडी की करारी हार का एक बड़ा कारण उसका पारंपरिक मुस्लिम-यादव (एमवाई) वोट बैंक का बिखरना है। एआईएमआईएम के आँकड़े भी इसकी गवाही देते हैं। 2020 के चुनाव में उसे 1.03 फीसदी वोट मिले थे जो अब बढ़कर 1.85 फीसदी हो गए हैं। यह आँकड़ा लगभग दोगुना है। ऐसा माना जा रहा है कि जिन क्षेत्रों में यादव समुदाय की संख्या कम है वहाँ मुस्लिम मतदाताओं ने अब सेकुलर दलों को वोट देने की मजबूरी को दरकिनार करते हुए अपनी पसंद के दल या उम्मीदवार को जिताने का रास्ता चुना है।

क्या अखिलेश यादव के लिए खतरे की घंटी है?

एआईएमआईएम का यह उभार उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव के लिए गंभीर चेतावनी है। यूपी के कई ऐसे जिले हैं जहाँ मुसलमानों की आबादी अच्छी खासी है लेकिन सपा का आधार माने जाने वाले यादवों की संख्या कम है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक बड़ा हिस्सा इसी श्रेणी में आता है।

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इसके अलावा अखिलेश यादव पर यह आरोप भी लग रहे हैं कि वे वरिष्ठ मुस्लिम नेता आजम खान के मसले पर पर्याप्त मुखर नहीं रहे। इस वजह से मुस्लिम समुदाय में एक तरह की नाराज़गी की बात सामने आ रही है। यदि यही नैरेटिव (धारणा) ज़ोर पकड़ता है और असदुद्दीन ओवैसी 2027 के विधानसभा चुनाव में यूपी में बड़ी संख्या में उम्मीदवार उतारते हैं तो अखिलेश यादव की चुनावी राह बहुत मुश्किल हो सकती है।

यूपी के किन जिलों में हो सकता है बड़ा बदलाव?

पश्चिमी यूपी के कई जिलों जैसे गाजियाबाद नोएडा हापुड़ मेरठ मुजफ्फरनगर शामली बागपत सहारनपुर बिजनौर मुरादाबाद संभल और रामपुर में यादवों की संख्या चुनाव परिणामों को प्रभावित करने लायक नहीं है। इसके अलावा अवध क्षेत्र के भी कई जिले ऐसे हैं जहाँ यादव अच्छी संख्या में हैं तो वहीं बीजेपी के समर्थक माने जाने वाले ठाकुर और ब्राह्मण जैसे समुदाय भी बड़ी आबादी में मौजूद हैं।

यदि मुस्लिम मतदाताओं को लगा कि वे सपा का साथ दिए बिना भी कुछ सीटों पर अपना उम्मीदवार जिता सकते हैं और उन्होंने इस विकल्प को अपनाया तो यूपी की राजनीति का समीकरण बदल जाएगा। 2022 के चुनाव में ओवैसी को यूपी में 0.49 फीसदी वोट मिले थे। अगर बिहार की तरह यह आँकड़ा बढ़कर 2 फीसदी या उसके आसपास पहुँचता है तो यूपी की चुनावी तस्वीर पूरी तरह बदली हुई नज़र आएगी।

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